कुमाऊंनी भाषा, साहित्य और संस्कृति प्रचार समिति एवं कुमाऊंनी मासिक पत्रिका पहरू की ओर से सर्वोदय साधक स्व. केदार सिंह कुंजवाल की स्मृति में तीन दिवसीय सातवां राष्ट्रीय कुमाऊंनी भाषा सम्मेलन कल्याणिका आश्रम डोल के सभागार में शुरू हो गया है। मुख्य अतिथि साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त वरिष्ठ साहित्यकार मुथरा दत्त मठपाल ने कहा कि लोगों को कुमाऊंनी भाषा बोलने में शर्म की बजाए गर्व महसूस करना चाहिए। उन्होंने कुमाऊंनी भाषा के संरक्षण के लिए लोगों से आगे आने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि हमें अपने घरों में आम बोल चाल में कुमाऊंनी भाषा का इस्तेमाल करना चाहिए। मुख्य वक्ता वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. शेर सिंह बिष्ट ने कहा कि कुमाऊंनी भाषा को बढ़ावा देने के लिए विवि के स्नातक पाठ्यक्रम में एक विषय के रूप में लागू किया गया है। इसे शीघ्र स्नाकोत्तर पाठ्यक्रम में भी लागू करने के प्रयास किए जाएंगे। प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा स्तर पर भी कुमाऊंनी भाषा को पाठ्यक्रम में लागू करने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए। जलागम परिषद के उपाध्यक्ष दिनेश कुंजवाल ने कहा कि कुमाऊंनी भाषा के संरक्षण के लिए सभी को एकजुट होकर काम करना होगा।
वक्ताओं ने कहा कि कुमाऊंनी भाषा का इतिहास काफी समृद्ध है। कुमाऊंनी कवि गुमानी पंत जैसे कई रचनाकारों ने कुमाऊंनी में साहित्य सृजन किया है। उनका यह भी कहना था कि चंद राजाओं के समय में कुमाऊंनी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त था। इस मौके पर पूरन कांडपाल, ब्रिगेडियर वीरेंद्र कुमार जोशी, देव सिंह पिलख्वाल, देवकी कुंजवाल, दयानंद आर्या, शंकर जोशी, नीरज पंत, महेंद्र ठकुराठी, अजय तिवारी, लता पांडे आदि ने विचार रखे। सम्मेलन में कुमाऊंनी फिल्म मेघा आ के निर्देशक जीवन सिंह बिष्ट, स्वामी कपिलेश्वानंद, बालम सिंह कपकोटी, चंदन रावत, नंदन प्रसाद, रमेश राम, धन सिंह फत्र्याल, दान सिंह फर्त्याल, हरीश नेगी, माहेश्वरी बिष्ट, लीला मनराल, गोपाल सिंह बिष्ट, मनोहर कुंजवाल आदि मौजूद थे। अध्यक्षता पूरन चंद्र कांडपाल और संचालन डा. हयात सिंह रावत ने किया।
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