खेल स्टेडियम का अभाव पर्यटन नगरी की कई सांस्कृतिक और खेल गतिविधियों को लील चुका है। आजादी से पूर्व शुरू हुई जद्दोजहद आज भी मुकाम तक नहीं पहुंची है। हर चुनाव में नेता इस मुद्दे पर जमकर वोट बटोरते हैं, लेकिन खेल गतिविधियों के लिए नागरिक आज भी सेना के मोहताज दिखते हैं। 2016 में मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कैबिनेट की बैठक में खेल स्टेडियम को मंजूरी दी थी, लेकिन भूमि चयन के बावजूद आज तक स्टेडियम अस्तित्व में नहीं आ सका है।
खेल मैदान के अभाव के चलते 1946 में शुरू हुई प्रतिष्ठित प्रांतीय फुटबाल प्रतियोगिता 1949 में दम तोड़ गई। 1954 से इस मांग को लेकर वृहद आंदोलनों को दौर चला। 1971 में सेना के सहयोग से शुरू हुई अखिल भारतीय हॉकी प्रतियोगिता भी मैदान के अभाव में 1979 में खत्म हो गई।
वरिष्ठ फुटबाल कोच मो. इदरीश बाबा ने बताया कि 1983 में आंदोलन के बाद ऐरोली गांव के निकट 3.943 एकड़ भूमि जनरल स्व. बीसी जोशी राष्ट्रीय स्टेडियम बनाने के लिए तमाम नेताओं के दरवाजे खटखटाए, कैंट से नक्शा भी पास हो गया, लेकिन इस स्थान पर पूर्व सैनिकों की कालोनी बनाने की सुगबुगाहट हुई, तो मामला खटाई में पड़ गया। निकटवर्ती एनसीसी मैदान को नागरिकों को देने की बात हुई, तत्कालीन विधायक करन माहरा की निधि से 40 लाख रुपये कैंट को मिले, लेकिन निर्माण कार्य की निगरानी ठीक से नहीं हो सकी।
2016 में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अल्मोड़ा की कैबिनेट बैठक में खेल स्टेडियम स्वीकृत कराया, राय स्टेट के पास भूमि भी चयनित की गई, लेकिन दो साल बाद भी स्टेडियम बनाने की कवायद शुरू नहीं हो सकी है।
एनसीसी और राजपुरा को श्रमदान कर बनाते हैं खेलने योग्य
खेल मैदान का अभाव में स्थानीय युवाओं ने कभी एनसीसी मैदान को श्रमदान कर खेलने योग्य बनाया, तो कभी राजपुरा मैदान को। लेकिन जनप्रतिनिधियों को यह सह नहीं दिखाई देता। खेल मैदान नहीं होने के कारण न तो यहां ग्रीष्मोत्सव हो पा रहा है और ना ही शरदोत्सव।
मैने इस मुद्दे को गत दिनों विधानसभा में भी उठाया, बताया जा रहा है कि राय स्टेट के पास चयनित भूमि में चीड़ के पेड़ अधिक दिखा दिए गए हैं, जिसके चलते यह मामला भारत सरकार में लंबित है। स्टेडियम अस्तित्व में आए इसके लिए वह पूरा प्रयास कर रहे हैं। - करन माहरा, विधायक रानीखेत।