अल्मोड़ा। प्रदेश सरकार भीमल, कंडाली और रामबांस के रेशे के व्यवसाय को राज्य की अर्थ व्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण बताते हुए इस व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए तमाम घोषणाएं करती रही है। इन वनस्पतियों का रेशा खरीदने के लिए बाकायदा खादी ग्रामोद्योग को पांच लाख रुपए की अग्रिम राशि भी दे दी गई।
खादी ग्रामोद्योग के छह कर्मचारी करीब दो माह तक कुमाऊं के चिन्हित गांवों में रेशा उत्पादकों को खोजते रहे, लेकिन इस योजना की असलियत तब सामने आई जब पूरे कुमाऊं से सिर्फ 975 रुपए के रेशे की खरीद हुई, जबकि रेशा एकत्र करने में ही 10 हजार रुपए से अधिक खर्च हो गए।
बता दें कि राज्य में भीमल, कंडाली और रामबांस के रेशे का उत्पादन बढ़ाने और इसे लोगों की आय का जरिया बनाने के लिए सरकार ने प्रोत्साहन राशि देने की घोषणा की थी। कुमाऊं में मुक्तेश्वर, मजखाली, सोमेश्वर, सेराघाट, मुनस्यारी, गंगोलीहाट, थल, चंपावत, लोहाघाट, ओखलकांडा, कपकोट, बैजनाथ आदि इलाकों में शुरू से ही भीमल, रामबांस आदि का उत्पादन हुआ करता था।
खादी ग्रामोद्योग विभाग ने रेशा उत्पादन वाले इन परंपरागत क्षेत्रों के काश्तकारों के बीच जाकर सरकार द्वारा दी जा रही सुविधाओं और अनुदान आदि के बारे में जानकारी दी। बाद में सीजन के वक्त खादी ग्रामोद्योग के आधा दर्जन कर्मचारियों की टीम एक वाहन लेकर रेशा खरीदने के लिए कुमाऊं के इन चिन्हित गांवों में गई, लेकिन करीब दो माह तक घूमने के बाद इन सभी गांवों से सिर्फ 65 किलो भीमल का रेशा एकत्र हो सका।
विभाग ने भीमल के रेशे का खरीद मूल्य सिर्फ 15 रुपए किलो रखा है। इस हिसाब से संबंधित काश्तकारों को 975 रुपए का भुगतान कर दिया गया। गांवों में रेशा खरीदने पहुंचे खादी ग्रामोद्योग विभाग के कर्मचारियों को ग्रामीणों ने बताया कि रेशा उत्पादन में काफी मेहनत लगती है और इसके लिए पानी की भी जरूरत होती है।
जिस कीमत पर सरकार रेशा खरीद रही है उसे देखते हुए ग्रामीणों की इस काम में कोई दिलचस्पी नहीं है और न ही इस काम से उनका गुजारा संभव है। इसके अलावा रामबांस और कंडाली के रेशे का उत्पादन भी कोई काश्तकार अब नहीं करता। अब रेशा खरीद के लिए एडवांस में भेजे गए पांच लाख रुपए में से उक्त राशि काटकर शासन को वापस कर दिए गए हैं।