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Almora News: खुमाड़ बना स्वतंत्रता आंदोलन की मजबूत पहचान, कुली-बेगार के विरोध से जगी जनचेतना

Fri, 04 Sep 2026 11:13 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, अल्मोड़ा
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 सल्ट के खुमाड़ में स्थित शहीद स्मारक।
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मौलेखाल (अल्मोड़ा)। आजादी के संघर्ष की लंबी यात्रा ने खुमाड़ को स्वतंत्रता आंदोलन की ऐसी पहचान दी, जिसे आज भी श्रद्धा से याद किया जाता है। सल्ट में स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना को मजबूत करने में कुली-बेगार प्रथा के विरोध की महत्वपूर्ण भूमिका रही। अंग्रेजी शासन के दौरान पहाड़ के लोगों को अधिकारियों के सामान ढोने और विभिन्न प्रकार के श्रम के लिए मजबूर किया जाता था। कुमाऊं में बेगार के खिलाफ उठी आवाज ने सल्ट के ग्रामीणों को भी संगठित किया। धीरे-धीरे स्वतंत्रता, स्वराज और अंग्रेजी शासन से मुक्ति की भावना गांव-गांव तक पहुंचने लगी।
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सल्ट में आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने में स्थानीय नेताओं और शिक्षित युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही। पुरुषोत्तम उपाध्याय और लक्ष्मण सिंह अधिकारी जैसे लोगों ने ग्रामीणों को संगठित किया। सल्ट के लोगों का संघर्ष केवल राजनीतिक आजादी तक सीमित नहीं था। जंगलों पर अंग्रेजी सरकार के नियंत्रण और ग्रामीणों के पारंपरिक वन अधिकारों पर प्रतिबंध ने भी लोगों में असंतोष पैदा किया। 1931 के आसपास मोहान क्षेत्र में जंगल संबंधी अधिकारों को लेकर आंदोलन हुआ। पुलिस कार्रवाई, गिरफ्तारियां और दमन भी हुए, लेकिन आंदोलनकारियों का हौसला नहीं टूटा। यही लगातार चलती जनचेतना आगे चलकर 1942 के निर्णायक संघर्ष की जमीन तैयार कर रही थी।
भारत छोड़ो आंदोलन ने दी निर्णायक धार
अगस्त 1942 में महात्मा गांधी के ‘भारत छोड़ो’ और ‘करो या मरो’ के आह्वान ने देशभर में आंदोलन को नई दिशा दी। सल्ट पहले से ही राजनीतिक रूप से जागृत था। लिहाजा यहां भी आंदोलन ने तेजी पकड़ ली।
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अंग्रेजी प्रशासन ने आंदोलन को दबाने के लिए दमन का रास्ता अपनाया, सितंबर 1942 के शुरुआती दिनों में आंदोलनकारियों की बैठकें होने लगीं। ग्रामीण बड़ी संख्या में एकत्र होने लगे।
पांच सितंबर 1942 : खुमाड़ में चलीं गोलियां
पांच सितंबर 1942 सल्ट के इतिहास का सबसे रक्तरंजित और गौरवपूर्ण दिन बन गया। खुमाड़ में बड़ी संख्या में ग्रामीण और आंदोलनकारी एकत्र थे। उनका उद्देश्य अंग्रेजी शासन के विरोध में अपनी आवाज बुलंद करना था। प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने का प्रयास किया। लोगों ने नेताओं से गिरफ्तारी न देने और शांतिपूर्ण ढंग से डटे रहने का आग्रह किया।
इसी दौरान तत्कालीन एसडीएम जॉनसन पुलिस, पटवारी, पेशकार और अन्य कर्मचारियों के साथ खुमाड़ पहुंचा और पुलिस को सीधे गोली चलाने का आदेश दे दिया। गोलियों की बौछार में खुमाड़ निवासी गंगाराम (33) और खीमानंद (23), पुत्र टीकाराम, घटनास्थल पर ही शहीद हो गए। स्वतंत्रता सेनानी चूड़ामणि (56) और बहादुर सिंह (52) गंभीर रूप से घायल हुए, जिनमें चूड़ामणि बाद में शहीद हो गए। कई अन्य आंदोलनकारी भी घायल हुए। खुमाड़ की धरती इन स्वतंत्रता सेनानियों के रक्त से लाल हुई, लेकिन इसी बलिदान ने इसे स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में अमर कर दिया। सल्ट के इसी अदम्य प्रतिरोध के कारण महात्मा गांधी ने इसे ‘कुमाऊं की बारदोली’ की संज्ञा दी। खुमाड़ स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों का प्रमुख केंद्र बन गया।
शहीद दिवस की परंपरा
हर वर्ष पांच सितंबर को खुमाड़ में शहीद दिवस मनाया जाता है। यह केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि उन लोगों को स्मरण करने का अवसर है जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए। खुमाड़ स्थित शहीद स्मारक पर श्रद्धांजलि दी जाती है। क्षेत्र के लोग, जनप्रतिनिधि, प्रशासन और विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक संगठनों के लोग शहीदों को नमन करते हैं। शहीद दिवस नई पीढ़ी को यह याद दिलाता है कि आजादी सहज उपलब्ध उपलब्धि नहीं थी। इसके पीछे हजारों ज्ञात-अज्ञात लोगों का संघर्ष और बलिदान छिपा है। खुमाड़ की मिट्टी आज भी उस गोलीकांड की गवाह है और सल्ट की पहाड़ियां आज भी उन नारों की गूंज अपने भीतर समेटे हैं जो कभी अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देने के लिए उठे थे।
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