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खष्टी का बेटा इंजीनियर, बेटी डॉक्टर

Sat, 07 Mar 2015 11:44 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, अल्मोड़ा।
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विपरीत परिस्थितियों में भी हौसला और उम्मीद बनी रहे तो मंजिल मिल ही जाती है। इस बात को अल्मोड़ा के जोशीखोला में रहने वाली खष्टी पंत ने सच कर दिखाया। 1989 में पति की मौत के बाद उन्होंने हौसला नहीं खोया और सस्ता गल्ला की दुकान चलाकर बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाई। आज उनका बेटा इंजीनियर है और बेटी एमबीबीएस अंतिम वर्ष में पढ़ाई कर रही है।
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खष्टी पंत के पति दयाकृष्ण पंत मालरोड में जोशीखोला के पास कंट्रोल की दुकान चलाते थे। 1989 में उनका  निधन हो गया। तब बेटा गौरव पांच साल का और बेटी सुमन सात साल की थी। दोनों बच्चों की जिम्मेदारी खष्टी पर आ गई। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और बच्चों को अच्छी शिक्षा देकर काबिल बनाने की ठान ली। पति की राशन की दुकान चलाने लगी। बिजनेस को भी आगे बढ़ाया कंट्रोल के राशन के अलावा उन्होंने परचून का सामान भी बेचा। बच्चों को डीएवी, केंद्रीय विद्यालय और बीरशिवा स्कूलों में पढ़ाया। केवी से इंटरमीडिएट करने के बाद बेटे गौरव ने पंतनगर विश्वविद्यालय से बीटेक किया। गौरव टाटा कंस्लटेंसी कंपनी मुंबई में इंजीनियर है और बेटी सुमन सुशीला तिवारी मेडिकल कालेज हल्द्वानी में एमबीबीएस अंतिम वर्ष की छात्रा है। हालांकि बच्चों की पढ़ाई के दौरान कई बार आर्थिक दिक्कत भी आई। बच्चों की सफलता पर खष्टी संतुष्ट हैं।

उनका कहना है कि सुख और दु:ख परीक्षा की घड़ियां हैं। विपरीत परिस्थितियों में हौसला खोने से परिवार के बिखर जाने की आशंका रहती है। वह कहती हैं कि कोई भी काम छोटा और बड़ा नहीं होता। धैर्य के साथ काम करते रहने और दु:ख का समय कट जाने के साथ ही लक्ष्य भी हासिल हो जाता है।
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