परदादा की डायरी के पन्ने इंग्लैंड निवासी 60 वर्षीय जर्मी एस सैले स्मिथ को सात समुंदर पार से अल्मोड़ा खींच लाए। जर्मी के परदादा सेप्टेम एस ब्रावर 1907 में अल्मोड़ा के ऐतिहासिक प्रधान डाकघर में मुख्य लिपिक (पोस्टमास्टर) रहे थे। जर्मी को उनके परदादा की स्मृतियों का अल्मोड़ा तो नहीं मिला मगर डाकघर का भवन हू-ब-हू वैसा ही पाकर उन्हें बहुत खुशी हुई। उनके परदादा को अल्मोड़ा से इतना गहरा लगाव था कि उन्होंने इंग्लैंड में घर नाम भी अल्मोड़ा हाउस रखा था। जर्मी के साथ उनकी पत्नी जैनी भी आई हैं।
जर्मी और उनकी पत्नी जैनी बृहस्पतिवार को अल्मोड़ा पहुंचे। जर्मी ने बताया कि उनके परदादा सेप्टेम एस ब्रावर 1907 में अल्मोड़ा के डाकघर में मुख्य लिपिक (पोस्टमास्टर) रहे थे। उन्होंने अल्मोड़ा के अलावा नैनीताल और मसूरी में भी काम किया। जर्मी ने बताया कि उनके दादा सैरिल का जन्म भी देहरादून में हुआ और पिता कैनिथ का जन्म 1921 में नैनीताल के प्रेम कॉटेज में हुआ था। जर्मी ने बताया कि परदादा करीब 1935 में सपरिवार इंग्लैंड लौट गए और वहां स्वैनजी शहर में बस गए। परदादा ने स्वैनजी में मकान बनाया जिसका नाम अल्मोड़ा हाउस रखा था। उन्होंने बताया कि परदादा ने भारत में बिताए दिनों पर डायरी भी लिखी है।
डायरी में लिखे संस्मरणों के आधार पर ही उन्होंने भारत आकर परदादा के कार्यस्थल पर जाकर उनकी यादों को ताजा करने की ठानी। वह पहली बार भारत आए हैं यहां आकर उन्हें काफी अच्छा लगा है। जर्मी ने बताया कि परदादा ने संस्मरणों में अल्मोड़ा में बिताए गए पलों के बारे में लिखा है कि तब जाड़ों के दिनों में पहाड़ के अधिकांश लोग मैदानों में चलेे जाते थे। अल्मोड़ा में जाड़े के समय काफी ठंड पड़ती थी ।
कम लोग ही जाड़े के मौसम में अल्मोड़ा में रुका करते थे। जर्मी बताते हैं कि 108 साल बाद आज जब वह अल्मोड़ा पहुंचे तो उन्हें दादा की स्मृतियों का अल्मोड़ा पूरी तरह बदला नजर आया है। वह कहते हैं कि उन्हें इस बात की खुशी है कि डाकघर का तब का स्वरूप आज भी बरकरार है। उन्होंने आग्रह किया कि प्रधान डाकघर के भवन को धरोहर के रूप में बरकरार रखना चाहिए। भविष्य में जब भी उन्हें भारत आने का अवसर मिलेगा तो वह परदादा की कर्मस्थली अल्मोड़ा जरूर आना चाहेंगे। वह प्रधान डाकघर के कर्मचारियों से भी मिले और प्राचीन भवन का फोटो भी ले गए।