रानीखेत (अल्मोड़ा)। पर्वतीय क्षेत्रों से युवाओं का निरंतर पलायन क्षेत्र की तकनीकी शिक्षा की बदहाली को बयां कर रहा है। तमाम अभावों के बीच क्षेत्र में वर्षों पूर्व स्थापित आईटीआई केंद्र जहां अपने वजूद को बचाने की जंग लड़ रहे हैं, वहीं तंत्र के नुमाइंदे अभावग्रस्त संस्थानों की व्यवस्था सुधारने के बजाए नए केंद्रों की स्थापना के नाम पर वोट बटोरने की जुगत में लगे रहते हैं। अनदेखी के कारण ही चिलियानौला स्थित आईटीआई जहां किराए के भवन में चल रहा है, वहीं संस्थान में कार्यशाला का भी अभाव बना हुआ है।
रानीखेत में 1986 में राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान को स्वीकृति मिली, लेकिन भवन के लिए भूमि नहीं मिल पाई। वर्तमान में यह संस्थान चिलियानौला में किराए के भवन में चल रहा है। स्थापना के वक्त जहां इस केंद्र में यहां इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रीशियन, मोटर मैकेनिक, हिंदी आशुलिपि ट्रेड में प्रशिक्षण दिया गया, वहीं राज्य बनने के बाद मोटर मैकेनिक का प्रशिक्षण बंद हो गया और मशीनें हल्द्वानी आईटीआई में शिफ्ट कर दी गईं।
2007 में हिंदी आशुलिपि का प्रशिक्षण भी बंद कर दिया गया। अगस्त 2013 से इलेक्ट्रॉनिक्स ट्रेड भी बंद है। वर्तमान में संस्थान में मात्र इलेक्ट्रीशियन ट्रेड संचालित हो रहा है। इसमें 17 ट्रेनी रजिस्टर्ड हैं। वर्कशॉप न होने के कारण थ्योरी कक्ष में ही बच्चों को वर्कशॉप भी कराई जा रही है।
संस्थान में तीन अनुदेशक तैनात हैं, थ्री फेस लाइन न होने के कारण प्रयोगात्मक कार्यों में दिक्कतें आती हैं। लेक्ट्रीशियन ट्रेड के प्रथम वर्ष के छात्र संजय राम का कहना है कि संस्थान में हॉस्टल की सुविधा नहीं है, कंप्यूटर लैब खुलनी चाहिए। अतिरिक्त ट्रेडों का संचालन किया जाना चाहिए। बंद ट्रेडों का संचालन होगा, तो स्थानीय युवाओं को इसका लाभ मिलेगा।
छात्र संजय भैसोड़ा का कहना है कि संस्थान में कमियां ही कमियां हैं। प्रयोगात्मक कार्यों के लिए वर्कशॉप नहीं है। थ्योरी कक्ष में ही बमुश्किल प्रैक्टिकल किए जा रहे हैं, जिस कारण भारी परेशानी होती है। आईटीआई, चिलियानौला के प्रभारी आरपी जोशी कहते हैं कि संस्थान में फोरमैन का पद सात माह से खाली है। संस्थान के निजी भवन के लिए घोड़ीखाल में 30 नाली भूमि चयनित है, जो शासन स्तर पर लंबित है।