जाने माने साहित्यकार और साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त पद्मश्री डा. रमेश चंद्र शाह ने कहा कि हिंदी भाषा का सही प्रयोग नहीं होने से उसमें अन्य भाषाओं का घालमेल होने लगा है।
उन्होंने शिक्षा के स्तर में आ रही गिरावट पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि वर्तमान में शिक्षक अपना कर्तव्य सही ढंग से नहीं निभा रहे हैं। वह बच्चों को पढ़ाने के बजाए सिर्फ अपना समय व्यतीत कर रहे हैं। इस मौके पर उन्हें बहादुर सिंह बनौला कुमाऊंनी साहित्य सेवी सम्मान से नवाजा गया।
कुमाऊंनी भाषा साहित्य संस्कृति प्रचार समिति के तत्वावधान में लक्ष्मी भंडार हुक्का क्लब में हुए कार्यक्रम में डा. शाह ने कहा कि हिंदी के शिक्षक और भी लापरवाह हैं क्योंकि वह बच्चों को नहीं पढ़ाते हैं।
इस मौके पर कहा कि अपनी कविताओं के जरिए उन्होंने उत्तराखंड की संस्कृति में ढोल, दमौ, कस्यारे, तौले, भांडे, गीत, शगुनाखर आदि खो जाने और कुमाऊंनी भाषा की मौजूदा स्थिति के दर्द को उकेरा है।
पालिकाध्यक्ष प्रकाश जोशी ने कहा कि डा. शाह की कविताओं में अल्मोड़ा को महत्व मिला है। अध्यक्षता करते हुए महादेवी वर्मा सृजनपीठ के निदेशक प्रो. देव सिंह पोखरिया ने कहा कि साहित्यकार समाज से लेता नहीं बल्कि समाज को देता ही देता है।
उन्होंने साहित्यकारों से डा. शाह के गोबर गणेश और विनायक उपन्यासों के अंतरसंबंधों को जानने का आह्वान किया। प्रो. दिवा भट्ट ने डा. शाह की कथावाचक कहानी का पाठ किया। पहरू पत्रिका के डा. हयात सिंह रावत ने कहा कि कुमाऊंनी साहित्य का इतिहास लिखने की जरूरत है।
प्रो. देव सिंह पोखरिया, डा. हयात रावत, पालिकाध्यक्ष प्रकाश जोशी, शंकर लाल शाह, नरेंद्र बनौला ने डा. शाह को बहादुर सिंह बनौला कुमाऊंनी साहित्य सेवी सम्मान और प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित किया।
कार्यक्रम में डा. तेजपाल सिंह, प्रो. केसी जोशी, प्रो. दिवा भट्ट, श्याम लाल साह, डा. जेसी दुर्गापाल, पवनेश ठकुराठी, ललित जोशी, डा. चंद्र सिंह चौहान, उदय किरौला, शिवचरण पांडे, आकाशवाणी के निदेशक मनोहर बृजवाल, नीरज भट्ट, त्रिभुवन गिरी महाराज, दयानंद कठैत, लता पांडे, हेम चंद्र जोशी, विनीता जोशी, अजय तिवारी, रमेश गोस्वामी, डा. जीवन सिंह मेहता, डा. शमशेर सिंह बिष्ट, जंगबहादुर थापा, जेसी, दयाकृष्ण कांडपाल, कंचन तिवारी, महेश भट्ट, किरन आदि मौजूद थे। संचालन डा. हयात रावत ने किया।
जाने माने साहित्यकार डा. रमेश चंद्र शाह ने कहा कि आज की पीढ़ी को कुमाऊंनी भाषा बोलने में शर्म महसूस कर रही है। इसमें बहुत कुछ अभिभावकों का भी दोष है। यहां के अभिभावक आज अपने बच्चों को कुमाऊंनी भाषा नहीं सिखा रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमें आपसी बोलचाल में कुमाऊंनी भाषा का ही प्रयोग करना चाहिए।