यहां बिजौरिया गांव निवासी इंद्र सिंह धामी लकड़ी, खड़िया, चीड़ के बगेट से विभिन्न प्रकार की आकृतियां बनाने में महारत हासिल कर चुके हैं। वह देवी देवताओं, महापुरुषों की दर्जनों आकृतियां उकेर चुके हैं। उन्होंने बगेट से बर्तनों के नमूने तैयार किए हैं। साधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि के इंद्र सिंह की यह कृतियां इतनी जीवंत हैं कि देखने वाले को बरबस की खींच लेती हैं।
बिजौरिया में एक सामान्य किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले 35 वर्षीय इंद्र्र सिंह धामी ने हाईस्कूल तक की पढ़ाई कर कुछ सालों तक गुजरात और मुंबई में नौकरी की। बाद में घर लौट आए और खेती बाड़ी से आजीविका चलाने लगे। इंद्र सिंह के अनुसार बचपन में चित्रकला से प्रेम था, लेकिन दिशा नहीं मिल सकी। 2001 से खेतों, जंगलों में बेकार पड़ी लकड़ियाें, खड़िया के पत्थरों पर कलाकृतियां उकेरना शुरू किया। लोगों से सराहना मिली।
बाद में चीड़ के बगेट से पहाड़ी शैली का घड़ा आदि बर्तन बनाने शुरू किए। अभी तक गणेश, शिव, दुर्गा, महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, विवेकानंद आदि की प्रतिमाओं के साथ ही कुल्हाड़ी, खुकरी आदि हथियार, बरतन बना चुके हैं।
पिछले कुछ सालों से वह उद्योग विभाग के माध्यम से यहां उत्तरायणी मेले मेें स्टाल लगा रहे हैं। जहां कुछ मूर्तियां बिक जाती हैं। इस कला के लिए उद्योग विभाग उन्हेें जिला स्तर पर ईनाम दे चुका है। अब राज्य के हस्तशिल्प पुरस्कार के लिए उनके नाम की संस्तुति की गई है। इंद्र सिंह के अनुसार इस कला को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए तो राज्य के विकास में यह सहायक साबित हो सकता है।
जिला उद्योग केेंद्र बागेश्वर के महाप्रबंधक बीसी पाठक कहते हैं कि इंद्र सिंह धामी की कला सराहनीय होने के कारण उन्हें राज्य स्तरीय पुरस्कार की संस्तुति की गई है। धामी उत्पादन बढ़ाते हैं तो उन्हें विपणन के लिए पर्यटन स्थलों पर सुविधाएं प्रदान की जाएंगी।