आजादी से पहले की बनी अल्मोड़ा जेल में अल्मोड़ा के अलावा बागेश्वर, पिथौरागढ़ और चंपावत के कैदी और ट्रायल बंदी रखे जाते हैं। यह चारों जिलों की एकमात्र जेल है। चारों जिलों के कैदी और ट्रायल आरोपी उक्त जिलों के न्यायालयों में पेशी के बाद वापस अल्मोड़ा लाए जाते हैं। जेल की क्षमता 102 है लेकिन यहां वर्तमान में 135 बंदी रखे गए हैं। एक बैरिक काफी समय से खराब पड़ी है, लेकिन उसे दुरुस्त नहीं कराया जा रहा है।
अल्मोड़ा की ऐतिहासिक जेल अंग्रेजों के शासनकाल में बनाई गई थी। संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत पिथौरागढ़, चंपावत, बागेश्वर जिलों का गठन बाद के वर्षों में हुआ, लेकिन इन तीनों जिलों में जेल आज तक नहीं बनी है और फिलहाल नई जेल निर्माणाधीन भी नहीं है। अल्मोड़ा जेल की स्थिति भी ठीक नहीं है। चार बैरिकों में तीन में पुरुष और एक में महिला कैदी रखी जाती हैं। एक बैरिक खराब हालत में है। जेल से मिली जानकारी के मुताबिक नई जेल बनने की संभावनाओं को देखते हुए खराब पड़े बैरिक को ठीक करने के प्रस्ताव को मंजूरी नहीं मिली है। चारों जिलों के कैदी और ट्रायल आरोपी उक्त जिलों के न्यायालयों में पेशी के बाद वापस अल्मोड़ा लाए जाते हैं। जबकि अल्मोड़ा से इन तीनों जिलों की दूरी लगभग 80 से 120 किमी तक है। इन जिलों में अलग जेल नहीं होने से लगभग हर रोज उक्त जिलों से पुलिस कर्मी एक वाहन लेकर अल्मोड़ा आते हैं और फिर कैदियों अथवा ट्रायल बंदियों को वाहन में बैठाकर संबंधित जिले के न्यायालय में पेशी के लिए ले जाते हैं और फिर शाम को उन्हें वापस अल्मोड़ा लेकर आते हैं।
वाहनों में हर रोज कैदियों को पुलिस कर्मियों समेत लाने-ले जाने में भी हजारों रुपये का खर्चा आता है। खास तौर पर खूंखार अपराधियों को इतनी दूर पेशी पर लाना-ले जाना काफी जोखिमपूर्ण काम रहता है। यह भी बता दें कि डेढ़ माह पहले रानीखेत के निकट पॉक्सो के एक मामले में पकड़ा गया आरोपी जेल के गेट के पास पहुंचने पर पुलिस कर्मियों को चकमा देकर फरार हो गया था। हालांकि उसे कुछ दिनों बाद गिरफ्तार कर लिया गया। इससे पहले 2003 में बागेश्वर से पेशी से लौटते वक्त तीन आरोपी कफड़खान के पास पुलिस कर्मियों को चकमा देकर भाग गए थे। हालांकि इन्हें भी कुछ समय बाद गिरफ्तार कर लिया गया था। लोगों का मानना है कि इस स्थिति को देखते हुए हर जिले में अलग जेल बनाई जानी चाहिए।