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अदद खेल मैदान की आस में बाबा भी संसार से हो गए विदा

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रानीखेत (अल्मोड़ा)। अदद खेल मैदान की आस लिए आखिरकार फुटबाल के द्रोणाचार्य मो. इदरीश बाबा भी संसार से विदा हो गए, लेकिन न तो मैदान बना और न ही स्टेडियम का सपना साकार हो सका। बाबा जीवनभर फाइलों का पुलिंदा हाथों में लेकर कई दफ्तरों के चक्कर काटते रहे, लेकिन स्वीकृत खेल स्टेडियम की फाइलें केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय में धूल फांक रही हैं।
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खेल मैदान के अभाव के चलते 1946 में शुरू प्रतिष्ठित प्रांतीय फुटबाल प्रतियोगिता 1949 में बंद हो गई। 1954 से इस मांग को लेकर वृहद आंदोलनों को दौर चला। 1971 में सेना के सहयोग से शुरू हुई अखिल भारतीय स्तरीय हॉकी प्रतियोगिता भी मैदान के अभाव में 1979 में बंद हो गई। बाबा बताते थे, 1983 में आंदोलन के बाद ऐरोली गांव के पास 3.943 एकड़ और 4.497 क्षेत्रफल भूमि में उत्तराखंड के प्रथम जनरल स्व. बीसी जोशी राष्ट्रीय स्टेडियम बनाने के लिए बाबा ने नेताओं के दरवाजे खटखटाए, कैंट से नक्शा भी पास हो गया, लेकिन इस स्थान पर पूर्व सैनिकों की कॉलोनी बनाने की सुगबुगाहट हुई, तो मामला खटाई में पड़ गया।
बाबा को मरते दम तक खेल मैदान का ही दुख सालता रहा। उन्होंने पूरा जीवन खेल को दे दिया। रानीखेत शहर को खेल मैदान उपलब्ध कराने की चुनौती अब स्वयं लेनी है, इसका संकल्प लेते हैं।
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-दिनेश तिवारी, एडवोकेट।
खेल मैदान के लिए बाबा ने काफी संघर्ष किया, लेकिन हसरत पूरी नहीं हो सकी। मैदान के अभाव में फुटबाल, हॉकी की बड़ी प्रतियोगिताएं बंद हो गईं। शरदोत्सव, ग्रीष्मोत्सव आयोजन के लिए भी मैदान का अभाव सालता है।
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-विमल सती, वरिष्ठ पत्रकार, रानीखेत।
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