वन विभाग का तेंदुए को मारने का पूरा आपरेशन अनुभवी शिकारी लखपत सिंह पर निर्भर हो गया है, परंतु इस बीच उनके गांव चले जाने से तेंदुए को मारने का अभियान शिथिल पड़ता नजर आ रहा है। क्षेत्र में दो लोगों की मौत के साथ ही कई मवेशी तेंदुए का निवाला बन चुके हैं इस सबके बावजूद आदमखोर तेंदुए के हाथ न आने से लोगों का रोष स्वाभाविक है।
एक कहावत है कि अधिक बिल्लियों में चूहे नही मारे जा सकते हैं कुछ इसी तरह की स्थिति आदमखोर को मारने में तैनात शिकारियों की फौज को देखकर प्रतीत हो रही है। पहले ग्राम पंचायत मैहलचौरा में भूपाल सिंह और बाद में चितैली में तारासिंह को अपना निवाला बनाने वाला आदमखोर तेंदुआ शिकारियों के निशाने पर नहीं आ पा रहा है। अधिकारियों की माने तो आदमखोर तेंदुआ मैहलचौरा, चितैली और महाकालेश्वर के निकटवर्ती क्षेत्रों में ही घूम रहा है। शुक्रवार को बमनगांव के दड़माड़ में पेड़ पर चढ़ा तेंदुआ अधिकारियों के पहुंचने तक भाग गया।
विभाग द्वारा पहली बार महाकालेश्वर में ट्रैप हुए तेंदुए की तस्वीर ही शिकारियों को दी गई है। उनसे इसी आधार पर तेंदुए को शूट करने को कहा गया है।
स्थानीय शिकारियों को निकटवर्ती गावों में लगाया गया है।
एक स्थानीय शिकारी का कहना था कि कुछ स्थानों पर लोगों द्वारा शोर मचाने और पटाखे छोड़ने से भी तेंदुआ हाथ नहीं आ पा रहा है। हालांकि विभाग द्वारा लखपत सिंह रावत और हरीश धामी के अलावा स्थानीय स्तर पर पांच और शिकारी लगाए गए हैं। परंतु लगता है कि पूरा अभियान लखपत सिंह पर अधिक निर्भर हो गया है। वन क्षेत्राधिकारी बीएस बिष्ट ने बताया कि लखपत सिंह घर में किसी का स्वास्थ्य बिगड़ जाने के चलते अपने गांव गैरसैंण चले गए हैं। उनके जाते ही पूरा अभियान धीमा सा प्रतीत हो रहा है।