जीआईसी रघुलीपीपल के भवन में पड़ी दरार।
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उत्तराखंड में पंचायत चुनाव का बिगुल बज चुका है। गांवों में विकास के दावे और वादों की गूंज सुनाई दे रही है लेकिन हकीकत में ताड़ीखेत विकासखंड के सैकड़ों गांव आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतें आज तक पूरी नहीं हो सकीं।
सरकारी रिकॉर्ड में अधिकतर गांवों को सड़कों से जोड़ने का दावा किया है लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। मल्ला विश्वा, दाड़िमा, गैरा जैसे गांवों में आज भी सिर्फ कच्ची सड़कें हैं। बरसात में ये कीचड़ से लथपथ हो जाती हैं और गर्मियों में धूल उड़ाती हैं। ग्रामीण हर चुनाव में पक्की सड़क का सपना देखते हैं लेकिन हर बार सिर्फ वादा ही हाथ आता है। स्वास्थ्य सेवाएं भी नाम मात्र की हैं। अधिकतर गांवों में स्वास्थ्य केंद्र तो है लेकिन छोटी बीमारी में भी लोगों को कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। रोजगार की कमी के कारण युवा गांव छोड़ रहे हैं। पलायन की रफ्तार इतनी बढ़ गई है कि कई गांव आधे खाली हो गए हैं।
2011 की जनगणना के अनुसार क्षेत्र की जनसंख्या 66,831 थी जो अब घटकर लगभग 55000 रह गई है। ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव आते ही घोषणाएं होती हैं लेकिन काम कभी नहीं होता। अब पंचायत चुनाव के माहौल में एक बार फिर वही वादे दोहराए जा रहे हैं।