उच्च न्यायालय के आदेश के बाद शायद अब कुछ समय बाद उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में कानून व्यवस्था के लिए अंग्रेजों के शासनकाल से चली आ रही पटवारी व्यवस्था इतिहास बन जाएगी। अंग्रेजों ने उत्तराखंड के ग्रामीण अंचल में रहने वाले लोगों के बीच कानून व्यवस्था कायम करने के लिए वर्ष 1861 में अनूठी पटवारी (राजस्व) व्यवस्था शुरू की थी। लोग इसे गांधी पुलिस के नाम से भी जानते हैं। देश के दूसरे किसी राज्य में पुलिस की ऐसी व्यवस्था नहीं है।
राज्य के 60 प्रतिशत पर्वतीय क्षेत्र की पुलिस व्यवस्था आज भी बगैर वर्दी वाले इन पटवारियों के अधीन है, लेकिन हाइटेक हो चुके अपराधियों से आज सिर्फ एक डंडे के सहारे निपटना कठिन साबित हो रहा है। खुद राजस्व पुलिस कर्मी इस व्यवस्था को अब अव्यवहारिक मानने लगे हैं। यही वजह है कि राजस्व निरीक्षक उपनिरीक्षक महासंघ ने इस संबंध में उच्च न्यायालय के फैसले को स्वागत योग्य बताया है।
उत्तराखंड में इस समय कुल 1217 पटवारी चौकियां हैं। इनमें एक-एक पटवारी और एक अनुसेवक के पद सृजित हैं। इससे ऊपर का अधिकारी कानूनगो होता है और राजस्व पुलिस व्यवस्था का सबसे बड़ा अधिकारी नायब तहसीलदार होता है। कानूनगो और नायब तहसीलदारों पर पटवारी क्षेत्रों में मुकदमों की समीक्षा आदि की जिम्मेदारी रहती है। दहेज हत्या, एससीएसटी एक्ट जैसे खास मामलों की जांच नायब तहसीलदार को सौंपी जाती है।
उनसे ऊपर तहसीलदार, एसडीएम और डीएम ग्रामीण क्षेत्रों की कानून व्यवस्था की समीक्षा करते हैं। दरअसल, अंग्रेजों ने जिस दौर में इस अनूठी राजस्व पुलिस व्यवस्था का गठन किया था तब की परिस्थितियां कुछ और थीं। आज से कुछ दशक पहले तक जहां पटवारी क्षेत्रों में पूरे साल कोई मुकदमा दर्ज नहीं होता था, लेकिन अब औसतन 10-12 मुकदमे दर्ज हो जाते हैं। सभी आपराधिक मामलों की विवेचना के अलावा अभियुक्तों की गिरफ्तारी, न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल करने और उन्हें जेल भेजने आदि सभी जिम्मेदारी पटवारियों पर ही है। पुलिस कार्य के अलावा उन पर गांवों में नागरिकों की जमीन का लेखा जोखा रखने, विभिन्न प्रमाणपत्र जारी करने और आपदा प्रबंधन सहित अन्य सरकारी कार्यों का दायित्व भी है।
राजस्व निरीक्षक उपनिरीक्षक महासंघ के कुमाऊं मंडल अध्यक्ष कमाल अशरफ का कहना है कि कई वर्षों से मांग के बावजूद राजस्व पुलिस कर्मियों को सुविधा के नाम पर डंडे से अधिक कुछ नहीं मिला। ऐसी स्थिति में कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालना और ग्रामीण क्षेत्रों में अपराधों पर नियंत्रण करना मुश्किल हो रहा है।
हम न्यायालय के फैसले का सम्मान करते हैं। यह फैसला वर्तमान परिस्थितियों के अनुकूल है। अंग्रेजों ने जब इस व्यवस्था को शुरू किया था, तब से लेकर आज तक इसमें कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। जबकि आज स्थितियां काफी बदल गई हैं। दूसरी तरफ पटवारियों को कानून व्यवस्था के साथ ही तमाम अन्य कार्य भी सौंप दिए गए हैं।
- कमाल अशरफ, कुमाऊं मंडल अध्यक्ष राजस्व निरीक्षक, उपनिरीक्षक अनुसेवक महासंघ।