सोमेश्वर (अल्मोड़ा)। शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए उन दानदाताओं ने कभी नहीं सोचा होगा कि जिस शिक्षा के लिए हम अपनी भूमि दान दे रहे हैं, उसका आजाद भारत में ऐसा हश्र होगा कि अभिभावक अपने बच्चों को यहां पढ़ाने से भी कतराने लगेंगे।
उन्हें तो बस अपनी पीढ़ी में शिक्षा की ज्योति जलाने की ललक थी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं और आजाद देश के नेताओं और अधिकारियों ने उनके अरमानों को कुचल डाला। इसका जीता जागता उदाहरण है राजकीय इंटर कालेज सोमेश्वर।
ताकुला ब्लॉक का 99 वर्ष पहले बने इस स्कूल के भवन की स्थिति जीर्ण-शीर्ण है। छत से पानी टपकता है। छात्र-छात्राओं के बैठने के लिए पर्याप्त फर्नीचर नहीं हैं। शिक्षकों के सात पद रिक्त होने से बच्चों की पढ़ाई चौपट है, लेकिन अधिकारी और जनप्रतिनिधि इस ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं। 1979 में स्कूल में में 600 बच्चे पढ़ते थे, वर्तमान में छात्र संख्या घटकर 260 रह गई है।
स्वतंत्रता से पूर्व 1917 में सोमेश्वर के कुछ बोरा परिवारों ने स्कूल स्थापित करने के लिए 126 नाली भूमि दान में दी। प्रारंभ में जिला परिषद से संचालित स्कूल कक्षा आठ तक खुला और छात्रावास की भी सुविधा थी। 126 नाली में से एक हिस्से में स्कूल भवन बना।
शेष भूमि में खेती, मछली और मुर्गीपालन भी किया जाता था। इससे स्कूल को आय भी होती थी। 1968 में स्कूल का हाईस्कूल और 1979 में इंटरमीडिएट में उच्चीकरण हुआ। स्कूल की 79 नाली भूमि महाविद्यालय को दे दी गई है और स्कूल के पास अब 47 नाली भूमि ही रह गई है।
इंटरमीडिएट कालेज में उच्चीकरण के समय 600 से अधिक बच्चे पढ़ते थे। 1990-91 में स्कूल में 445, 1999-2000 में 391, 2006-07 में 364 बच्चे, 2013-14 में 217 बच्चे, चालू शिक्षा सत्र में 260 बच्चे अध्ययनरत हैं। स्कूल में एलटी संवर्ग के नौ पदों में से गणित, विज्ञान, व्यायाम शिक्षक, प्रवक्ता संवर्ग में नौ पदों में से भौतिकी, गणित, हिंदी, इतिहास के शिक्षकों के पद खाली चल रहे हैं।
महत्वपूर्ण विषयों के शिक्षकों नहीं होने से बच्चों की पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हो रही है। स्कूल भवन जीर्ण-शीर्ण बना हुआ है। छत टपकती है। दीवारों में सीलन है। बच्चों के बैठने के लिए पर्याप्त फर्नीचर नहीं है। चहारदीवारी भी नहीं है। स्कूल की उपेक्षा से अभिभावकों में शासन, शिक्षा विभाग के खिलाफ आक्रोश व्याप्त है।