अल्मोड़ा/बागेश्वर/रानीखेत। हरेले का पर्व बुधवार को शहरों समेत गांवों में भी हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। कुमाऊं में सुबह पूजा, अर्चना के बाद नौ, 10 दिन पहले बोए गए हरेले को काटकर मंदिरों में चढ़ाया गया। इसके बाद हरेला शिरोधारण किया गया। अल्मोड़ा में नंदादेवी, रघुनाथ मंदिर, बद्रेश्वर मंदिर, बदरीनाथ, सिद्ध बाबा मंदिर, चितई और पातालदेवी मंदिर में लोगों ने हरेला चढ़ाया और पूजा, अर्चना की। बुजुर्गों ने जी रया जागि रया, यो दिन मास भेटने रया जैसे आशीर्वचन दिये। बच्चों ने भी एक दूसरे के सिरों पर हरेला चढ़ाकर उनके सुखमय जीवन की कामना की। मान्यता है कि हरेले पर लगाया गया पौधा नहीं सूखता है। इसलिए कई जगह पौधरोपण कर उनके संरक्षण का भी संकल्प लिया गया। घरों में विभिन्न पकवान भी बनाए गए। कोरोना काल में इन दिनों प्रवासी भी गांव लौटे हैं। प्रवासी बच्चों ने भी दादा, दादी और अन्य परिजनों संग हरेला मनाया। हरेले के साथ ही अब सावन मास भी शुरू हो गया है। सुबह से ही मंदिरों में लोग पूजा, अर्चना करने गए।
आशीर्वचनों पर कोरोना का पुट
बागेश्वर। हरेला के आशीर्वचनों पर कोरोना का पुट भी देखा गया। सोशल मीडिया पर हरेला के आशीर्वचन जी रया, जागि रया के स्थान पर जी रया, जाग रया, मास्क पैरिया, सैनिटाइजर लगाया, द्वि गज दूरी धरया, आपण घरों में रया, भ्येर ना आया, यो दुष्ट बीमारी हबे दूर रया (जीते रहना, जागते रहना, मास्क पहनना, सैनिटाइजर लगाना, दो गज की दूरी बनाना, अपने घरों में रहना, बाहर मत निकलना, इस दुष्ट बीमारी से दूर रहना) की धूम मची रही। संवाद
पहला हरेला मनाने मायके नहीं जा सकीं नवविवाहिताएं
अल्मोड़ा। पर्व हमारी रोजमर्रा की जिंदगी की ऊब और एकरसता को दूर कर मन में नई उमंग और ताजगी भर देते हैं। सावन में होने वाला कुमाऊं का प्रसिद्ध हरेला पर्व भी मन में नई उमंग और उत्साह भर देता है। नवविवाहितों को हरेले का बेसब्री से इंतजार रहता है। मान्यता है कि नवविवाहिताएं ससुराल में पहला हरेला मनाकर उसी दिन मायके भी जाती हैं लेकिन कोरोनाकाल में कई नवविवाहिताएं चाह कर भी हरेला मनाने मायके नहीं जा सकीं। उन्हें पहला हरेला ससुराल में ही मनाना पड़ा जबकि महानगरों में सेवारत कई महिलाएं न तो मायके आ सकीं और न ही ससुराल। ऐसे में उन्होंने कार्यस्थल वाले शहरों में ही हरेला मनाया।
शादी के बाद यह पहला हरेला पर्व है। इस हरेले का बेसब्री से इंतजार था। सावन माह में मायके में पहला हरेला पर्व मनाने का अलग ही आनंद है। अबकी बार हरेले को यादगार मनाने की तैयारी की थी, लेकिन कोरोना संक्रमण के डर से मायके नहीं जा सकी। इसका हमेशा मलाल रहेगा।
- गायत्री बगड़वाल भोज, मकेड़ी अल्मोड़ा
सावन का प्रसिद्ध पर्व हरेला मनाने मायके जाना था। इसकी कई दिन से तैयारी कर रही थी, लेकिन कोरोना के खौफ के चलते मायके नहीं जा सकी। हरेला ससुराल में ही परंपरागत तरीके से मनाया। मायके न जा पाने का मलाल तो है लेकिन इस समय कोरोना से बचना पहला लक्ष्य है।
- रितु धानक, ग्राम चौकुना अल्मोड़ा
हरेला पर्व ससुराल में ही सास, ससुर और अन्य परिजनों संग परंपरागत तरीके से मनाया। कोरोना महामारी के खौफ के चलते मायके नहीं जा सकी। आवाजाही में कोरोना संक्रमण फैलने का खतरा बना रहता है। ऐसे में कोरोना से बचने के लिए हरेला ससुराल में ही मनाना पड़ा।
- मोना बिष्ट, डुंगरा भनोली