वृद्ध मां की सेवा और धरती मां का प्रेम गोविंद गोपाल को अपने गांव दन्यां खींच लाया। 17 साल तक दिल्ली में मल्टी नेशनल कंपनी में नौकरी करने के बाद गोविंद गोपाल साढ़े तीन साल पहले करीब सवा लाख रुपये सेलरी वाली सीनियर मैनेजर की नौकरी छोड़कर गांव में बंजर खेतों को आबाद करने में लग गए। पत्नी आज भी दिल्ली में जॉब करती हैं और बेटा इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है। पत्नी और बेटे को दिल्ली में छोड़कर यह कर्मयोगी पिछले साढ़े तीन साल से वृद्ध मां की सेवा के साथ ही खेतों पर हरियाली लाने में जुटा है।
जिला मुख्यालय से करीब 60 किमी दूर दन्यां में रहने वाले गोविंद गोपाल ने प्रारंभिक शिक्षा अपने गांव के स्कूल से प्राप्त की। उसके बाद लोहाघाट पॉलीटेक्निक से डिप्लोमा किया और फिर थापर इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट पटियाला से बीटेक की डिग्री हासिल कर ली। बीटेक करने के बाद मल्टी नेशनल कंपनी में नौकरी करने लगे और सीनियर मैनेजर पद तक पहुंच गए। गांव से उनका काफी लगाव रहा और नौकरी के दौरान भी घर आते-जाते रहते थे। करीब दस साल पहले पिता का निधन हो गया। किसी बीमारी के चलते तीन भाइयों में से बड़े भाई भी कुछ साल पहले चल बसे। एक अन्य भाई बाहर नौकरी करते हैं।
घर पर वृद्ध माता और शारीरिक मानसिक रूप से अक्षम बहन अकेली रह गई थी। बुढ़ापे में मां को खुद देखरेख की जरूरत थी इसलिए खेती बाड़ी भी बंजर रहने लगी।
आखिरकार गोविंद गोपाल ने अपनी मां की देखरेख करने के साथ ही बंजर पड़े खेतों को आबाद करने की ठान ली। गांव में उनकी 33 नाली जमीन है। (एक नाली का मतलब 2160 वर्ग फुट)। उन्होंने 2015 में करीब सवा लाख रुपये वेतन वाली मल्टी नेशनल कंपनी की नौकरी छोड़ दी और घर लौट आए।
गोविंद गोपाल बताते हैं कि उन्होंने क्षेत्र में चल रही ग्राम्या योजना के तहत खेतों में जुताई करने के लिए हाथ से चलने वाला एक छोटा ट्रैक्टर भी लिया है। इसके सहारे वह बंजर खेतों को आबाद करने का काम कर रहे हैं। वह पिछले दो-तीन सालों से वह अपने खेतों में हल्दी, अदरक, टमाटर, बीन, हरी सब्जियां आदि के अलावा ब्राह्मी, माल्टा, नीबू, कागजी नीबू आदि उगा रहे हैं। खास तौर पर ऐसी फसल बो रहे हैं जिन्हें बंदर और अन्य जंगली जानवर कम नुकसान पहुंचाते हों। खेती से वह परिवार के गुजारे के साथ ही वह हर साल हजारों की कमाई भी कर रहे हैं। उन्होंने उन्नत नस्ल की गाय भी पाल रखी है। इसके लिए चारा जुटाने का काम भी गोविंद खुद करते हैं।
पात्रों को नहीं मिल रहा सरकारी योजनाओं का लाभ
गोविंद गोपाल का कहना है कि बीते साढ़े तीन साल में उन्होंने सरकारी व्यवस्था को काफी नजदीक से देखा है। उनका अनुभव यह है कि काश्तकारों के लिए चलाई जा रही कृषि और उद्यान से संबंधित तमाम अनुदान और ऋण योजनाओं का लाभ पात्र लोगों को नहीं मिल पा रहा है। योजनाओं का फायदा राजनीतिक दलों के वे कार्यकर्ता उठा रहे हैं जो वास्तव में कुछ और कार्य करते हैं, लेकिन सरकारी मशीनरी के सहयोग से कागजों में वह खुद को काश्तकार दर्शा कर गरीबों का हक छीन रहे हैं।
झूठे आंकड़े पहुंच रहे हैं सरकार के पास
गोविंद गोपाल का कहना है कि ग्रामीण खेती को लेकर सरकार के पास सही आंकड़े नहीं पहुंच रहे हैं क्योंकि सर्वेक्षण करने वाले राजस्व कर्मी गांव आकर आंकड़े जुटाने के बजाय अनुमानित और काल्पनिक आंकड़े भेज देते हैं। सूखा और अतिवृष्टि से होने वाले नुकसान का आकलन भी आमतौर पर सही तरीके से नहीं किया जाता। उनका यह भी कहना है कि सरकारी योजनाओं को सही ढंग से लागू किया जाए और गांवों में स्वास्थ्य, शिक्षा और कानून व्यवस्था की स्थिति को अच्छा किया जाए तो महानगरों से तमाम लोग अपने गांव लौटना चाहेंगे।