खादी वस्त्रों के विक्रय केंद्रों को लोग अब तक राष्ट्रपिता के नाम पर गांधी आश्रम से जानते थे, लेकिन जल्द ही यह नाम परिवर्तित होकर ‘खादी भारत’ हो जाएगा।
केंद्रीय खादी आयोग ने खादी और ग्रामोद्योग के क्षेत्र में काम कर रही संस्थाओं को दुकानों के बोर्ड पर ‘खादी भारत’ लिखवाने का सर्कुलर जारी किया है।
कुमाऊं क्षेत्र के चनौदा में 1937 से स्थापित क्षेत्रीय गांधी आश्रम संस्था अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर, चंपावत और ऊधमसिंह नगर जिलों में 40 बिक्री केंद्रों से खादी उत्पाद लोगों तक पहुंचते हैं।
इसके अलावा अन्य संस्थाओं के भी अलग-अलग नामों से विक्रय केंद्र हैं। यह विक्रय केंद्र गांधी आश्रम नाम से प्रसिद्ध हैं। राष्ट्रपिता के नाम से स्थापित गांधी आश्रम केंद्रों से जनता का दिल से जुड़ाव भी रहता है।
यही कारण है कि खादी उत्पादों को जनता तक पहुंचा रही संस्थाओं को कभी माल बेचने के लिए कोई ब्रांडिंग का सहारा नहीं लेना पड़ा।
सेंट्रल खादी कमीशन ने खादी उत्पादों को बेच रही संस्थाओं को सीडी और सर्कुलर भेज कर निर्देश जारी किए हैं कि गांधी के नाम ने चल रहे विक्रय केंद्रों को अब स्वयं के खर्च पर बोर्ड में निर्धारित साइज में खादी भारत लिखना अनिवार्य होगा।
हालांकि बोर्ड में ही छोटे शब्दों में विक्रय केंद्र चलाने वाली संस्था को उसका नाम लिखने की छूट होगी। आजादी के आंदोलन में जन-जन को जोड़ने वाली और महात्मा गांधी के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने वाली आजादी के दौर में स्थापित कई प्रतिष्ठित संस्थाओं की हालत लंबे समय से खस्ता है।
सरकारी स्तर पर इन संस्थाओं को आगे बढ़ाने में केंद्र और राज्य सरकारें कुछ समय के लिए खादी उत्पादों में कुछ छूट देने तक ही सीमित हैं।
इसके चलते संस्थाओं को करोड़ों रुपये का घाटा उठाना पड़ रहा है। दुकानों के बोर्ड बदलवाने के पीछे केंद्रीय खादी आयोग का भले ही जो भी उद्देश्य हो, परंतु इतना तय है कि सरकारी स्तर से संस्थाओं को आसानी से कच्चा माल उपलब्ध कराए बगैर और उत्पादित सामग्री के पुख्ता विपणन की व्यवस्था किए बगैर खादी उत्पादन और विक्रय में लगी संस्थाओं को दम तोड़ने से नहीं रोका जा सकता है।