अल्मोड़ा। एक मां की कांपती हथेलियां जब चार महीने बाद अपने शिशु को छू पाईं तो उसके आंसू बह निकले। पिता की आंखों में भी राहत और खुशी के सैलाब ने जगह बना ली। 125 दिन वेंटिलेटर पर ज़िंदगी और मौत के बीच झूलते अपने नवजात को जब पहली बार गोद में उठाया तो यह क्षण चिकित्साकर्मियों के अनूठे प्रयास की मिसाल बन गया। ऐसी कोशिश जिसने माैत को भी मात दे दी।
धौलादेवी ब्लॉक के कांडा नौला दौलिगाड़ की सपना टम्टा और उनके पति कृष्ण कुमार टम्टा को कुछ महीने पहले पता चला कि उनके घर जुड़वा संतानों की किलकारियां गूंजेंगी। कुछ जटिलताओं की वजह से 21 फरवरी 2025 को मात्र सातवें महीने में प्रसव हो गया। अत्यधिक कम वजन और कई दिक्कतों के कारण जन्म के कुछ ही समय बाद एक बच्चे की मृत्यु हो गई। अब डाॅक्टरों के सामने उसके सहोदर को बचाने की चुनाैती थी। कम संसाधनों वाले पहाड़ के एक सरकारी अस्पताल में यह आसान तो नहीं था लेकिन बेस अस्पताल की नवजात गहन चिकित्सा इकाई (एनआईसीयू) ने इस चुनाैती को स्वीकार किया और 125 दिन तक माैत से डटकर मुकाबला किया। वह अबोध तो अपनी पीड़ा और जिंदगी के लिए संघर्ष को क्या ही बयां कर पाता जिसे सात महीने तक गर्भ में रहने के बाद चार महीने मशीन की गोद में गुजारने पड़े और तब जाकर मां के आंचल की छांव नसीब हो सकी।
संघर्ष की ऐसी कहानी जो कभी नहीं भूलेगी
जन्म के समय शिशु का वजन मात्र 800 ग्राम था। उसकी हालत बेहद नाज़ुक थी। चिकित्सा अधीक्षक एवं बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. अमित कुमार सिंह ने बताया कि शिशु को लगातार 125 दिनों तक वेंटिलेटर और जीवन रक्षक उपकरणों के सहारे रखा गया। इस दौरान अस्पताल के डॉक्टरों, नर्सों और तकनीकी स्टाफ ने दिन-रात बिना थके उसकी देखभाल की। उसकी जान बचाने के लिए हर बार एक नई उम्मीद के साथ उसे 18 बार रक्त चढ़ाया गया। परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि इतने लंबे इलाज का खर्च उठा सके। ऐसे में अस्पताल के स्टाफ और स्थानीय समाजसेवियों ने आगे बढ़कर न केवल आर्थिक सहायता की बल्कि रक्तदान, देखभाल में सहयोग कर इस संघर्ष को साझा किया।
शिशु को जीवनदान देने वाली मेडिकल टीम में डॉ. बीएल जायसवाल, डॉ. गौरव पांडेय, डॉ. हर्ष गुप्ता, नर्सिंग इंचार्ज एकता सिंह और नीलिमा पीटर शामिल रहीं। इनके साथ नर्सिंग और तकनीकी स्टाफ ने भी दिन-रात अथक मेहनत कर सपना का ख्वाब टूटने से बचा लिया। इन्होंने सिर्फ एक बच्चे की ज़िंदगी ही नहीं बचाई बल्कि यह इन्सानियत, सेवा और सामूहिक प्रयासों की एक यादगार तस्वीर बन गई है।
अस्पताल से घर तक ''''''''खुशियों की सवारी''''''''
22 जुलाई को जब शिशु पूरी तरह स्वस्थ होकर 2.5 किलो वजन के साथ डिस्चार्ज हुआ तो पूरे अस्पताल परिसर में एक भावनात्मक लहर दौड़ गई। जिसने सुना उसके चेहरे पर मुस्कान थी और आंखों में खुशी के आंसू। खुशियों की सवारी से जब शिशु को घर भेजा गया तो डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ की आंखें भी भीगी हुई थीं। माता-पिता भर्राई आवाज में बार-बार कहते रहे कि आपने हमारे बच्चे को नया जीवन दिया। हम ताउम्र आपके एहसानमंद रहेंगे।
कोट
इतने लंबे समय तक वेंटिलेटर पर रहने के बाद शिशु का पूरी तरह स्वस्थ हो जाना अत्यंत दुर्लभ है। हम सबने इसे एक परिवार की तरह लिया और डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ ने उसी भावना से देखभाल की। यह चिकित्सा जगत के लिए एक मिसाल है। - डॉ. सीपी भैसोड़ा, प्राचार्य, मेडिकल कॉलेज अल्मोड़ा