पहाड़ के जिलों में बंदर और सुअरों से खेती को नुकसान बड़ी समस्या बन गयी है। हर कोई इनसे परेशान है। मगर जिन्हें हम चुनाव में वोट देकर संसद और विधानसभा में भेजते हैं। उन्हें हमारी इस समस्या से कोई सरोकार नहीं है। कुछ लोग तर्क दे सकते हैं कि सुअरों के नुकसान का तो मुआवजा मिल रहा है या फिर सुअरों को मारने के आदेश जारी हो चुके हैं। जहां तक मुआवजे का सवाल है, इसकी प्रक्रिया राजस्व और वन विभाग के बीच पेच में फंसा दी तो लोगों ने परेशान होकर मुआवजा मांगना ही छोड़ दिया।
सुअरों को मारने में भी एक बेतुकी शर्त रखी गयी है। सुअर को मारने वाला शिकारी उसी गांव का होना चाहिए। मगर अधिकतर गांवों में तो बंदूकें ही नहीं हैं या फिर जिन लोगों के पास हैं भी तो वे 70 से ऊपर की उम्र के हैं। कैसे मारे जाएंगे सुअर ? ये सवाल नेता जी से पूछिए। हिमाचल की जनता ने तो बंदरों को चुनावी मुद्दा ही बना दिया था। पहाड़ की सब्जियों और फसलों को बचाना हम सब की जिम्मेदारी है। अमर उजाला इसी के तहत अभियान शुरू कर रहा है।
रात भ्ार पहरा देते हैं
सुअर और बंदरों ने सब्जियां और अन्य फसलें चौपट कर दी हैं। ग्रामीण इलाकों में सुअरों के नुकसान से परेशान होकर किसानों ने गडेरी, पिनालू, आलू, मूली, प्याज अन्य सब्जियां लगाना छोड़ दिया है। या फिर कुछ क्षेत्रों में लोग रात में पहरा देकर सब्जी उत्पादन कर रहे हैं। शहर और आसपास के गांवों में सुअरों के नुकसान का खतरा कम है तो यहां बंदर मुसीबत बने हैं। बंदरों ने किचन गार्डन और खेतों को बंजर कर दिया है। साक सब्जियों का उत्पादन घटने से इसका असर लोकल बाजार पर भी पड़ा है। अल्मोड़ा में लौंबांज की गडेरी और शहरफाटक का आलू अब मुश्किल से मिलता है। बागेश्वर में शामा का आलू भी कम हुआ है। चंपावत में पाटी का आलू, मूंगफली तो पिथौरागढ़ के बाजार से गंगोलीहाट का आलू, नाचनी, मुवानी की गडेरी गायब होने लगी है। सब्जियां बेचकर अटक-बिटक में परिवार का खर्च चलाने वाले लोग या तो गांवों को छोड़ने को मजबूर हैं या फिर दूसरे धंधे की तलाश में हैं।