पर्वतीय कृषि के क्षेत्र में एक बार फिर विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (वीपीकेएएस) अल्मोड़ा के वैज्ञानिकों ने बड़ी सफलता हासिल की है। संस्थान के वैज्ञानिकों ने कड़े शोध के बाद पांच मुख्य फसलों की आठ नई उन्नतशील किस्में विकसित की हैं। विकसित किस्मों में मक्का की वीएल हिमाद्री (एफ एच 3879), जौ की वीएलबी 177, मसूर की वीएल मसूर 538 तथा वीएल मसूर 535, सोयाबीन की वीएल सोया 106 तथा वीएल सोया 107 तथा धान की वीएलधान 71 और वीएल धान 160 शामिल है। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की कृषि को समृद्ध करने के उद्देश्य से इन सभी किस्मों को राज्य किस्म विमोचन समिति की बैठक में आधिकारिक रूप से विमोचित कर दिया गया है। ये सभी किस्में पर्वतीय इलाकों में जैविक और वर्षा आधारित परिस्थितियों में समय पर बुवाई के लिए बेहद अनुकूल और अधिक पैदावार देने वाली हैं।
वीएल हिमाद्री (एफ एच 3879)
वीएलबी 177
यह जौ की एक नई उच्च उपज देने वाली द्वि-उद्देशीय किस्म है, जिसे वीपीकेएएस ने चयन पद्धति द्वारा विकसित किया है। तीन वर्षों के उत्तराखंड राज्य परीक्षणों में वीएलबी 177 ने 1,730 किग्रा/हेक्टेयर औसत दाना उपज दी, जो चेक किस्मों वीएलबी 118, वीएलबी 130 और यूपीबी 1008 की तुलना में क्रमशः 7.5, 10.3 एवं 23.9 प्रतिशत अधिक थी। यह किस्म पीला एवं भूरा रतुआ रोग के प्रति प्रतिरोधी पाई गई।
वीएल मसूर 538 (बड़े दाने वाली)
वीएल मसूर 535 (बड़े दाने वाली)
वीएल मसूर 535 उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में समय पर बोई जाने वाली वर्षा आधारित एवं जैविक खेती की परिस्थितियों के लिए अनुकूलित बड़ी दाना वाली मसूर की उन्नत किस्म है। इसकी औसत उपज क्षमता 1,202 किग्रा/हेक्टेयर है। यह 155-160 दिनों में परिपक्व होती है। पोषण की दृष्टि से यह किस्म श्रेष्ठ है, जिसके बीज में 24.91 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है। राज्य स्तरीय परीक्षणों में तीन वर्षों के परीक्षण के दौरान वीएल मसूर 535 ने उकठा रोग के प्रति प्रतिरोधी प्रतिक्रिया प्रदर्शित की।
वीएल सोया 106
वीएल सोया 106 उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की वर्षा आधारित और जैविक खेती की परिस्थितियों के लिए अनुकूलित सोयाबीन की उन्नत किस्म है। इसका पेडिग्री वीएलएस 75/वीएलएस59 है और इसकी औसत उपज 1,649 किग्रा/हेक्टेयर है। यह किस्म 115-120 दिनों में परिपक्व होती है तथा पौधों की औसत ऊंचाई 80-85 सेमी रहती है। इसके 100 बीजों का वजन 14.50 ग्राम है। खेत परिस्थितियों में परीक्षण के दौरान वीएल सोया 106 ने एफएलएस के प्रति प्रतिरोधता प्रदर्शितकी है।
वीएल सोया 107
वीएल सोया 107 उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की वर्षा आधारित एवं जैविक खेती की परिस्थितियों के लिए अनुकूलित सोयाबीन की उन्नत किस्म है। इसका पेडिग्री वीएलएस 63/हिमसो1685 है और इसकी औसत उपज 1700-1800 किग्रा/हेक्टेयर है। यह किस्म 115-120 दिनों में परिपक्व होती है तथा पौधों की औसत ऊंचाई 70-75 सेमी रहती है। इसके 100 बीजों का वजन 14.95 ग्राम है। खेत परिस्थितियों में परीक्षण के दौरान वी0एल0 सोया 107 ने एफएलएस रोग के प्रति प्रतिरोधी प्रतिक्रिया प्रदर्शित की है।
वीएल धान 71 (वी एल 32471,आईईटी 28213)
इस किस्म को उत्तराखंड की पर्वतीय क्षेत्रों और घाटियों की सिंचित रोपाई जैविक परिस्थितियों के लिए जारी किया गया है यह एक लंबी पतली (छिलका रहित दाने की लंबाई 7.32 मिमी और लंबाई/चैड़ाई अनुपात 3.53) धान की प्रजाति है जिसे वीपीकेएएस अल्मोड़ा में खजीया धान/वी एल 30424 से विकसित किया गया है। यह प्रजाति प्रमुख बीमारियों जैसे पत्ती और बाली झौंका (स्कोर 1-3), भूरी चित्ती (स्कोर 3-4), और दानों का बदरंगपन (स्कोर 0-1) के लिए प्रतिरोधी है और तनाबेधक एवं पत्ती लपेटक (स्कोर 0-3) के लिए भी प्रतिरोधी पाई जाती है। इसमें बहुत अच्छी गुणवत्ता वाले लक्षण जैसे 78 प्रतिशत छिलका उतारने की प्रतिशतता, 69 प्रतिशत कुटाई/प्रसंस्करण की प्रतिशतता, 54 प्रतिशत साबुत चावल की प्राप्ति, 21.06 प्रतिशत की मध्यवर्ती एमाइलोज सामग्री हैं। इसके पौधे की ऊंचाई 80-85सेमी और पकने की अवधि 125-130 दिन है। एसवीटी में जैविक परिस्थितियों में तीन वर्षों के परीक्षण के दौरान, इस किस्म की औसत उपज 3,609 किलोग्राम/हेक्टेयर है और इसने उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में सर्वोत्तम चेक पंत धान 26 से 21.50 प्रतिशत तथा विवेक धान 62 की तुलना में 22.30 प्रतिशत का महत्वपूर्ण उपज लाभ दिखाया है।
वीएल धान 160 (वीएल 20986, आईईटी 30525)
यह प्रजाति वर्षाश्रित उपराऊ जेठी धान में जैविक परिस्थितियों में बोई जाने हेतु विमोचित की गयी। जैविक परिस्थितियों में इस प्रजाति की औसत उपज 2,321 किलोग्राम/हेक्टेयर देखी गई है जो कि मानक प्रजाति विवेक धान 154 की तुलना में 18.37 प्रतिशत तथा वीएल धान 156 की तुलना में 10.78 प्रतिशत अधिक है। इस किस्म को वीएल 7620/वीएल 8801 के संकरण से विकसित किया गया है। इसके पौधे की ऊंचाई 90-95 सेमी तथा प्राकृतिक स्थिति में पत्ती एवं बाली झौंका (स्कोर 1-3), भूरी चित्ती (स्कोर 3-4), पर्णच्छद विगलन (स्कोर 1), पर्णच्छद अंगमारी (स्कोर 3) आभासी कण्ड (स्कोर 0-1) पत्ती लपेटक और तनाबेधक (स्कोर 0-3) के खिलाफ प्रतिरोधी पाया गया है। इस प्रजाति के पौधे की ऊंचाई मध्यवर्ती, पौधे अर्ध-खड़ी और नहीं गिरने वाले होते हैं।
वैज्ञानिकों ने कड़ी मेहनत कर नई किस्मे विकसित की है। ये नई किस्में कम पानी और पारंपरिक जैविक खाद के साथ भी पहाड़ों की विषम भौगोलिक परिस्थितियों में किसानों की आय दोगुनी करने और खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने में मील का पत्थर साबित होंगी। डॉ. लक्ष्मी कांत, निदेशक वीपीकेएएस अल्मोड़ा