अल्मोड़ा। जीबी पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान कोसी कटारमल के मिशन सभागार में जल स्रोतों की पारिस्थितिकी को परिभाषित करने और इसके मापन आदि विषयों पर चर्चा के लिए आयोजित वेबिनार में वक्ताओं ने कहा कि जलस्रोतों का पारिस्थितिकी अध्ययन एक जटिल प्रक्रिया है। इसे एक एक जैव भू और भौतिक इकाई मानते हुए इस पर परिकल्पना आधारित शोध अधिक परिणाम मूलक होंगे।
वेबिनार के संयोजक इंजीनियर किरीट कुमार ने सभी प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए इस विषय पर निरंतर मंथन पर जोर दिया। इस अवसर पर जलस्रोत पारिस्थितिकी को परिभाषित करने के लिए अब तक की विभिन्न परिकल्पनाओं और आयामों पर मंथन किया गया। भारतीय हिमालयी क्षेत्रों में जटिल भूगोल और विविधताओं को इसके पीछे के जटिल कारण बताया गया।
वक्ताओं ने कहा कि जल संकट के वैश्विक दौर में जल वैज्ञानिकों के सामने यह संकट है कि वह इस क्षेत्र में अध्ययन के ठोस परिणाम सामने लाएं जिससे समाज और पर्यावरण को लाभ हो सके। संस्थान के निदेशक डॉ. आरएस रावल ने कहा कि भारतीय हिमालयी क्षेत्र प्राकृतिक और जल संसाधनों की विविधता से लैस है और बड़ी संख्या में मानव समाज इस पर निर्भर हैं। इसलिए हमें इसे समग्रता में देखना होगा और इस क्षेत्र में परिणाम मूलक अध्ययनों और शोध कार्यों को आगे बढ़ाना होगा।
इस अवसर पर संस्थान के वैज्ञानिक डॉ संदीपन मुखर्जी, इंजीनियर वैभव आदि ने प्रस्तुतिकरण दिया। जाने माने वैज्ञानिक प्रो. वीके गौड़ (बंगलूरू) ने वेबिनार की अध्यक्षता की। इस मौके पर वाडिया संस्थान देहरादून के वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रो. एसके भरतरिया, आईआईटी रुड़की के प्रो. सुमित सेन, प्रो. कृष्णस्वामी, आईआईटी रुड़की से प्रो. एके सर्राफ, जेएनयू से प्रो. एपी डिमरी, रंजन जोशी, डॉ. वसुधा अग्निहोत्री, डॉ. विक्रम नेगी आदि ने भागीदारी की।