संचार के साधन बढ़ने के साथ ही रामलीलाओं में हास्य व्यंग की विधा भी समाप्ति की ओर है। कई साल पहले तक रामलीलाओं में जोकरों की खास भूमिका होती थी।
मंचन में देरी होने पर जोकर हास्य विधा से लोगों का मनोरंजन करते थे। उन्हें देखने के लिए लोगों की काफी भीड़ जुटती थी।
कारखाना बाजार निवासी 65 वर्षीय सईद अहमद सत्तर के दशक में कई रामलीलाओं में जोकर का किरदार निभा चुके हैं। पेशे से पेंटर सईद बताते हैं कि नगर के नंदादेवी के अलावा मुरली मनोहर, राजपुर, धारानौला, एनटीडी हवालबाग आदि स्थानों पर जोकरिंग कर चुके हैं।
वह बताते हैं कि पूर्व में रामलीला के पात्र अंडा, मांस समेत लहसुन, प्याज तक नहीं खाते थे। रामलीला के दौरान सईद भी दस दिन तक लहसुन, प्याज तक नहीं खाते थे।
पहले रामलीला मेें जोकर का पात्र सभ्यता के साथ हास्य व्यंग करता था। उसे देखने के लिए काफी भीड़ जुटती थी। पर धीरे-धीरे पाश्चात्य संस्कृति के हावी होने से इसमें भी फूहड़ता आने लगी थी।
संचार क्रांति के चलते अब यह विधा समाप्ति की ओर है। सालों से सईद रामलीलाओं में पात्रों का मेकप भी करते आ रहे हैं।