तहसील के विभिन्न गांव, कस्बों में होने वाली रामलीलाओं में लोगों को पिछले पचास सालों से हंसाते आ रहे खीमदा जोकर अपनी अदाओं से लोगों को हंसाकर लोटपोट कर देते हैं।
कहते हैं कि पहले जमाने में लोग खूब हंसते थे, परंतु अब कार्य की अधिकता और तमाम तरह के तनावों के चलते हंसी का ग्राफ गिरता जा रहा है।
बाखली निवासी खीमानंद जोशी (65) उर्फ खीमदा जोकर बताते हैं कि पहले जमाने की रामलीलाओं में संसाधनों का अभाव था कैरोसिन से जलने वाले मैंटिल गैस के उजाले में रामलीला होती थी।
मनोरंजन के लिए टीवी आदि कोई साधन नहीं थे। जिसके चलते लोगों में रामलीलाओं को लेकर बड़ा उत्साह रहता था। उस दौर की रामलीलाओं में जोकरिंग का भी बड़ा आनंद था। लोग उनके स्टेज पर पहुंचते ही हंसना शुरू कर देते थे।
परंतु अब अंतरमन की हंसी देखने को नहीं मिलती है। लोग कुछ पलों के लिए हंसते हैं, परंतु बाद में उनके चेहरे पर वही चिंता की लकीरें नजर आती हैं।
आठवीं कक्षा तक पढ़े खीमदा बताते हैं कि वे जीवन भर लोगों को हंसाते रहे, परंतु खुद के लिए कुछ नहीं कर सके। अपने इसी हाल पर उन्होंने लिखा है- नाम म्यर प्रसिद्ध हैगो, खीमानंद जोकरा, आठ तक पढ़ी छू, अब खामरोई ठोकरा।
खीमदा बताते हैं कि वे पहले से तैयारी करने के बजाए स्टेज पर पहुंचने के बाद दर्शकों की इच्छा और माहौल को देखकर ही कार्यक्रम करते हैं।
बताते हैं कि उस दौर में रीठाचौरा के उदेसिंह, सोनगांव के श्यामसिंह वर्मा और चित्रेश्वर के जोधासिंह आदि भी उनके साथ जोकरिंग करते थे जो अब इस दुनिया में नही हैं।