अल्मोड़ा। एक समय पहाड़ी रसोई की शान रहे तांबे, कांसे और पीतल के बर्तन अब बाजारों से धीरे-धीरे गायब होते जा रहे हैं। आधुनिक जीवनशैली और सस्ते विकल्पों की ओर बढ़ते रुझान के चलते इन पारंपरिक बर्तनों की मांग में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है।
बाजार में इन बर्तनों की कीमत जहां एक हजार रुपये प्रति किलोग्राम से अधिक है, वहीं स्टील और प्लास्टिक जैसे हल्के व सस्ते विकल्प के रूप में 400 रुपये से ही उपलब्ध हैं।
आधुनिक जीवनशैली और सुविधा के चलते लोग अब पारंपरिक बर्तनों से दूरी बना रहे हैं। हालांकि तांबा, कांसा और पीतल जैसे धातुओं से बने बर्तन स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभकारी माने जाते हैं। लेकिन इनका रखरखाव और कीमत अधिक होने के चलते उपयोग में इनकी जगह अब कम होती जा रही है। एक समय था जब विवाह, नामकरण और अन्य पारिवारिक आयोजनों में इन बर्तनों की भारी मांग रहती थी।
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क्या कहते हैं व्यापारी
पारंपरिक बर्तनों की घटती बिक्री से न केवल धातु शिल्प पर संकट मंडरा रहा है, बल्कि इससे जुड़े कारीगरों की आजीविका पर भी असर पड़ रहा है। - गिरिजा शंकर, बर्तन विक्रेता, खंचाजी मोहल्ला, अल्मोड़ा
- पहले हर महीने तांबे, कांसे और पीतल के कई सेट बिक जाते थे लेकिन अब मुश्किल से कुछ ही ग्राहक ऐसे आते हैं जो इन बर्तनों की मांग करते हैं। -हरीश बिष्ट, बर्तन विक्रेता, चंपानगर स्याल्दे