अल्मोड़ा का भातखंडे संगीत महाविद्यालय।
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उत्तराखंड राज्य बने डेढ़ दशक से अधिक समय बीत गया है, लेकिन कुमाऊं मंडल का एकमात्र भातखंडे हिंदुस्तानी संगीत महाविद्यालय उपेक्षित है। सरकार और जनप्रतिनिधि महाविद्यालय की ओर आंखें मूंदे बैठे हैं। उपेक्षा के चलते यह संस्थान अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर रहा है।
संस्थान में सृजित प्रधानाचार्य समेत प्रवक्ताओं के चौदह पदों में से मात्र पांच पर ही नियमित प्रवक्ता तैनात हैं। जिस कारण विद्यार्थियों को महाविद्यालय का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
भारतीय शास्त्रीय संगीत की विधा को बढ़ावा देने के लिए अल्मोड़ा में 1989 में भातखंडे संगीत महाविद्यालय स्थापित हुआ। शुरुआत में धारानौला में जिला पंचायत के किराए के भवन में महाविद्यालय संचालित हुआ। शास्त्रीय गायन, सितार, कथक नृत्य, भरतनाट्यम विषय प्रारंभ किए गए। महाविद्यालय खुलने से छात्र-छात्राओं को शास्त्रीय संगीत के विभिन्न विधाओं को सीखने का मौका मिला। उप्र के समय में महाविद्यालय में प्रवक्ताओं के सभी पद भरे हुए थे। उत्तराखंड राज्य बनने के पश्चात तैनात 13 प्रवक्ता उप्र संवर्ग के थे और मूल प्रदेश लौट गए।
उत्तराखंड बनने के बाद संस्थान की स्थिति बिगड़ती गई और कभी भी सभी पद नहीं भरे रहे। वर्तमान में संस्थान में करीब 200 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। प्रधानाचार्य, प्रवक्ता गायन, कनिष्ठ प्रवक्ता भरतनाट्यम, कनिष्ठ प्रवक्ता सितार, संगतकर्ता तबला ही नियमित प्रवक्ता तैनात हैं। प्रवक्ता सितार, प्रवक्ता कथक नृत्य, संगकर्ता तबला, संगतकर्ता गायन कथक के पद पर संविदा कार्मिक तैनात हैं। संगतकर्ता सारंगी का पद नौ माह से अधिक समय से खाली है। कनिष्ठ प्रवक्ता गायन, संगतकर्ता गायन भारतनाट्यम के पद रिक्त हैं। सरकार और जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा से कुमाऊं मंडल का यह एकमात्र संस्थान उपेक्षित है।