सरकार पहाड़ में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने की बात करती रही है, लेकिन तकनीशियनों और डाक्टरों के अभाव में बेस अस्पताल अल्मोड़ा में करीब दो करोड़ की डायलेसिस, इंडोस्कोपी, लैब कोली सैट और ब्रोनकोस्कोट मशीनें पिछले करीब नौ साल से कमरों में जंक खा रही हैं। वहीं दो करोड़ लागत की मैमोग्राफी और डिजिटल एक्स-रे मशीनें भी पिछले दो साल से खराब पड़ी हैं। यदि ये मशीनें काम कर रही होती तो मरीजों को इलाज के लिए हल्द्वानी नहीं जाना पड़ता।
अल्मोड़ा बेस अस्पताल 1987 में बना था। इस अस्पताल में अल्मोड़ा के अलावा बागेश्वर, पिथौरागढ़ और गढ़वाल क्षेत्र के रोगी इलाज कराने पहुंचते हैं। पिछले एक दशक में अस्पताल की हालत खस्ता है। 2004 से 2006 के बीच अस्पताल में डायलेसिस, आडियोमीटर, लैब कोली, ब्रोनकोस्कोट, टीयूआर, टीएमटी, इंडोस्कोपी, इको कार्डियोग्राफी मशीनें खरीदी गई। अकेले डायलेसिस मशीन की कीमत 50 लाख है। ईको कार्डियोग्राफी मशीन की कीमत भी इतनी ही है। यह मशीनें करीब नौ साल से कमरों में पड़ी हैं।
अस्पताल की डायलेसिस यूनिट के लिए एक नेफ्रोलाजिस्ट, तीन तकनीशियन, छह स्टाफ नर्स और चार वार्ड ब्वाय की जरूरत है लेकिन यह पद आज तक सृजित नहीं हुए हैं। स्टाफ के अभाव में कई महत्वपूर्ण जांचें नहीं हो रही हैं। 1.26 करोड़ लागत का डिजिटल एक्स-रे और 73.50 लाख रुपए की मैमोग्राफी मशीन करीब पिछले दो साल से खराब पड़ी है जबकि एक डिजिटल एक्सरे मशीन काम कर रही है। इन अव्यवस्थाओं का खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ रहा है।