अल्मोड़ा। ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियंस (एक्टू) ने केंद्र सरकार द्वारा श्रम संगठनों की सहमति के बगैर श्रम कानूनों में संशोधन पर नाराजी जताई है। एक्टू ने आरोप लगाया है कि संशोधित कानून लागू होने से उद्योगों में श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी निर्धारण में सरकारों का हस्तक्षेप समाप्त हो जाएगा वहीं मजदूरों की काम की अवधि भी बढ़ जाएगी। संगठन के कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रपति को 11 सूत्रीय मांगपत्र भेजा है।
प्रशासन के माध्यम से राष्ट्रपति को भेजे ज्ञापन में कहा है कि नए संशोधन से श्रमिकों के हितों पर दुष्प्रभाव पडे़गा। एक्टू ने कहा है कि 1000 से कम कामगारों वाले उद्योगों में न्यूनतम वेतन के निर्धारण में केंद्र और राज्य सरकारों का हस्तक्षेप खत्म होकर पूंजीपतियों की मनमानी चलेगी। कारखाना निरीक्षक को कामगारों को 16 घंटे तक कारखाने में रोके रखने की छूट मिल जाएगी। ज्ञापन में कहा गया है कि राज्य बनने के बाद आशा, आंगनबाड़ी, भोजन माता, पेय जल विभाग के पीटीसी, ग्राम प्रहरी ऐसे अन्य विभागों में वर्षों से कार्यरत श्रमिकों को नाममात्र का वेतन देकर उनका शोषण किया जा रहा है।
ज्ञापन में श्रम कानूनों में किए संशोधनों को रद्द करने, बैंक, बीमा, रेलवे समेत सभी सार्वजनिक उपक्रमों में विदेशी पूंजी निवेश, पीपीपी मोड बंद करने, न्यूनतम मजदूरी 15 हजार प्रति माह किए जाने, सिडकुल ट्रेनी के नाम पर बेरोजगारों का शोषण रोकने आदि की मांग की गई है। ज्ञापन भेजने वालों में आशा वर्कर यूनियन की प्रदेश उपाध्यक्ष जानकी गुरुरानी, सरस्वती नेगी, अनिता नेगी, भगवती बिष्ट, सन्ना मेहता, खष्टी कनवाल, माया, नीमा मुस्यूनी, हीरा बिष्ट, तुलसी भट्टश् सीमा आर्या, चंद्रा बिष्ट आदि शामिल हैं।