अल्मोड़ा। बृहस्पतिवार को अल्मोड़ा के पूर्वी पोखरखाली में इंद्र सिंह मेहता के बेटे की बारात में जब दुल्हन डोली में बैठकर अपने ससुराल पहुंची तो लोगों के मुंह से अनायास ही निकल पड़ा हाय...आज् ब्योलि डोलि में बैठ बेर एगे। नगर तो छोड़िए गांवों में भी अब दुल्हन को डोली में लाने का रिवाज खत्म होने लगा है लेकिन अल्मोड़ा में रजिस्ट्रार कानूनगो इंद्र सिंह मेहता ने अपने बेटे का विवाह कुमाऊंनी रीति रिवाज में किया और दुल्हन को भी परंपरागत डोली में बिठाकर ससुराल लाया गया।
राजस्थान में एक कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर पद पर तैनात पुत्र महिमन का विवाह कुमाऊंनी रीति रिवाज से हुआ। दुल्हन जब डोली में बैठकर ससुराल के आंगन में पहुंची तो वहां मौजूद महिलाओं और अन्य लोगों को सुखद आश्चर्य हुआ। डोली के आगे सफेद रंग का और पीछे लाल रंग का निशान चल रहा था। दुल्हन सपना पंजाबी परिवार से ताल्लुक रखती है। वर्तमान में वह दिल्ली में एक कंपनी में कार्यरत है। सपना और महिमन दोनों ने एमबीए की पढ़ाई की है। जब सपना को बताया गया कि उसे अल्मोड़ा पहुंचने पर डोली में घर लेकर जाएंगे तो वह भी बहुत खुश हुई। पूर्वी पोखरखाली निवासी मंजुल कुमार पांडे तथा शांति भंडारी ने बताया कि 10-15 साल से उन्होंने नगर में किसी दुल्हन को डोली से आते नहीं देखा।
वरिष्ठ पत्रकार डा.शमशेर सिंह बिष्ट ने कहा कि उन्होंने पिछले दो दशक से अल्मोड़ा नगर में किसी दुल्हन को डोली से लाते नहीं देखा। इंद्र सिंह मेहता का कहना था कि डोली हमारी पारंपरिक परंपरा है और हमें इसे भूलना नहीं चाहिए। इंद्र सिंह ने 2004 में बड़ी लड़की को भी महतगांव स्थित अपने घर से डोली में बिठाकर ही विदा किया था। आधुनिकता के इस दौर में कारों का रिवाज बढ़ गया है। पहले पहाड़ों में बारातें पैदल जाती थी लेकिन अब गांव-गांव में सड़कें पहुंचने से बारातें भी कार और अन्य वाहनों में ही जाती हैं। पहले शादी ब्याह के वक्त गांव वाले भी सहयोग करते थे। जिससे आपसी भाईचारा भी बना रहता था लेकिन अब टेंट संस्कृति ने इस परंपरा को भी लगभग खत्म कर दिया है।