रानीखेत (अल्मोड़ा)। राष्ट्रीय पादप आनुवांशिकी संसाधन ब्यूरो तथा लोक चेतना मंच के की ओर से प्रगतिशील किसानों को पौध किस्म संरक्षण किसानों के अधिकार अधिनियम 2001 के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई। जैविक कृषि प्रशिक्षण केंद्र में आयोजित इस प्रशिक्षण में विभिन्न इकाइयों के वैज्ञानिकों ने भाग लिया। प्रशिक्षण में 50 से अधिक किसानों ने भाग लिया।
वैज्ञानिकों ने कहा कि मौसम परिवर्तन की चुनौतियों से पर्वतीय दुर्लभ फसलों का संरक्षण करना होगा।
वैज्ञानिक डा. पूरन सिंह मेहता ने कहा कि पर्वतीय क्षेत्र की फसलें और प्रजातियां दुर्लभ हैं। मौसम परिवर्तन की चुनौतियों से इनका संरक्षण करना जरूरी है। कहा कि 1000 से 2000 मीटर की ऊंचाई वाले मध्य हिमालयी क्षेत्र में लगभग 70 प्रकार की फसलों का कृषिकरण हो रहा है। लोक चेतना मंच के अध्यक्ष जोगेंद्र बिष्ट ने कहा कि परंपरागत फसलों कि किस्मों को बचाने की जिम्मेदारी किसानों के साथ-साथ सरकारी महकमों और स्वयं सेवी संस्थाओं की भी है। सभी को मिलजु ल कर काम करना होगा।
राष्ट्रीय पादप आनुवांशिकी संसाधन ब्यूरो की वैज्ञानिक डॉ. ममता आर्या ने पौध किस्म संरक्षण एवं किसानों के अधिकार अधिनियम 2001 के प्रावधानों के बारे में बताया। कहा कि भारत सरकार द्वारा किसानों को कृषि फसलों के संरक्षण एवं आविष्कार में पंजीकृत करवाना चाहिए। डॉ. राम नारायण ने बागवानी की जानकारी दी। डा कृष्ण माधव राय, लोक चेतना मंच के अजय रस्तागी ने कृषि क्षेत्र की चुनौतियों का उल्लेख किया। प्रशिक्षण केन्द्र मजखाली के प्रभारी डा देवेंद्र सिंह नेगी ने भी तमाम जानकारियां दी।
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