अल्मोड़ा। पिरुल से बिजली उत्पादन के लिए उद्यमी आगे नहीं आ रहे हैं, जबकि सरकार ने पिरुल नीति भी घोषित कर दी है। यदि पिरुल से बिजली उत्पादन शुरू होने लगा तो इससे जहां जंगलों में लगने वाली आग को कम किया जा सकेगा वहीं पिरुल विक्रय कर ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति में भी सुधार होगा।
उद्यमी उत्तराखंड अक्षय ऊर्जा विभाग (उरेडा) और वन विभाग के माध्यम से पिरुल आधारित बिजली उत्पादन इकाई स्थापित कर सकते हैं। पर्वतीय क्षेत्र के जंगलों में चीड़ की पत्तियां निष्प्रयोज्य पड़ी रहती हैं। पिरुल काफी ज्वलनशील होता है। जंगलों में आग लगने का मुख्य कारण पिरुल ही हैल लेकिन पिरुल की पत्तियों से बिजली भी उत्पादित होती है।
उरेडा ने हवालबाग ब्लॉक की आधार, नौला, सल्ला रौतेला, कुरचौन और लमगड़ा ब्लॉक की चौमू वन पंचायत में पिरुल आधारित बिजली इकाई स्थापित करने के लिए स्थान चिन्हित कर निदेशालय को भेजे थे, लेकिन कोई भी उद्यमी अब तक पिरुल आधारित बिजली इकाई स्थापित करने के लिए आगे नहीं आ रहा है।
उरेडा के जिला परियोजना अधिकारी जीसी मेहरोत्रा ने बताया कि इस संबंध में विभाग द्वारा पूर्व में जागरूकता कार्यशाला भी आयोजित कराई जा चुकी है। बेरीनाग में अवनी संस्था ने पिरुल से बिजली उत्पादित करने की इकाई स्थापित की है। इस संस्था द्वारा बग्वालीपोखर में पिरुल से बिजली बनाने की इकाई स्थापित करने की कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने कहा कि यदि कोई उद्यमी इकाई स्थापित करने के लिए विभाग में आवेदन करेगा तो उसे हर संभव मदद की जाएगी।