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दोहन की नीति के बजाय जल भंडारों को भरने की नीति बनानी होगी

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हमारी जल नीति संवर्द्धन के बजाय जल शोषण की नीति
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अल्मोड़ा। वैज्ञानिकों का मानना है कि हमारी जल नीति संवर्द्धन के बजाय जल शोषण की नीति रही है। यही वजह है कि पिछले 50-60 सालों में नदियों को पानी से लबालब करने वाले जल स्रोत, नौले और धारे सूख गए। हालत यह है कि पहले जल स्रोतों से पानी की लाइनें बनाई गईं, फिर नदियों से लिफ्ट योजनाएं बनाकर गांव और नगरों तक पहुंचाया गया। जब धरातल में पानी के सभी विकल्प समाप्त हो गए तो योजनाकारों ने पहाड़ों में भी हैंडपंप के जरिये भूमिगत जल खींचना शुरू कर दिया। जानकारों का मानना है कि जल शोषण की इस नीति से आने वाले बरसों में हैंडपंपों में भी पानी नहीं मिलेगा। इसलिए अब जल शोषण की नीति के बजाय जल भंडारों को भरने और जल स्रोतों के पुनर्जनन की नीति बनाने का समय आ गया है।
बता दें कि उन्नीसवीं सदी के अंतिम चरण तक पहाड़ के गांव, नगर और कस्बे पेयजल के लिए पूरी तरह नौलों और धारों पर आश्रित थे। जानकारी के मुताबिक उस दौर में हर गांव में नौले और धारे थे। इसका सबूत यह भी है कि उस दौर में जहां नौले धारे उपलब्ध थे वहीं लोगों ने गांव बसाए। नगरों और कस्बों में तो दर्जनों की संख्या में नौले और धारे उपलब्ध थे। कहा जाता है कि चंद शासकों की राजधानी रहे अल्मोड़ा नगर में कभी 360 नौले थे। इनमें से 40-50 तो आज भी मौजूद हैं। उन्नीसवीं सदी में जनसंख्या के विस्तार के साथ नदियों और नौले धारों की तरफ तो ध्यान नहीं दिया गया पर बढ़ती जनसंख्या को पानी उपलब्ध कराने के लिए जहां जल स्रोतों से पानी की लाइनें डालकर गांव तक पहुंचाई गई वहीं बाद के वर्षों में नदियों और स्रोतों से लिफ्ट योजनाएं बनाई गईं। आज हालत यह है कि पहाड़ में गांवों और नगरों के समीप शायद ही कोई नदी होगी जहां से लिफ्ट योजना नहीं बनी हो लेकिन गर्मियों में नदियों के सूखने से यह सभी लिफ्ट योजनाएं बाधित हो जाती हैं।
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नौले, धारे और गधेरों के मौसमी होने और पूरी तरह सूखने के बाद गरमी के मौसम में नदियों के सूखने का सिलसिला शुरू हुआ तब आसपास पेयजल का कोई विकल्प नहीं रहा। इसके बाद योजनाकारों की नजर धरती के भीतर आरक्षित भूमिगत जल भंडारों पर गई और धरती के भीतर छेद करके हैंडपंप के जरिये पानी निकालने का युग शुरू हुआ। अल्मोड़ा जिले में पहला हैंडपंप 1987 में पेयजल आपूर्ति के लिए प्राथमिक पाठशाला देवलीखान में लगाया गया। तब से 2002 तक इक्का दुक्का जगह ही हैंटपंप लगे, लेकिन 2003 से सड़कों के किनारे नगरों, कस्बों और गांवों में एक के बाद एक हैंडपंप लगने शुरू हो गए। अब तो पूरे पर्वतीय इलाकों में हर किमी में हैंडपंप मिल जाते हैं। हैंडपंपों के माध्यम से धरती के भीतर 50 से 120 मीटर गहराई से पानी निकाला जाता है। अब वैज्ञानिक पहाड़ों में हैंडपंपों का भविष्य चिंताजनक मान रहे हैं। अगर भविष्य में हैंडपंपों में भी पानी बंद हो जाएगा तो स्थिति और भी खराब हो जाएगी। नदियों की दशा के बारे में लंबे समय से अध्ययन कर रहे भूगोलविद् प्रो.जेएस रावत का कहना है कि हमारी जल नीति शोषण की नीति रही है। कभी भी सूखे हुए जल स्रोतों और नदियों के पुर्नजनन की नीति के बारे में गंभीरता से नहीं सोचा गया। उनका कहना है कि अब आगे जल दोहन की नीति के बजाय जल भंडारों को भरने और जल स्रोतों के पुनर्जनन की नीति बनाने का समय आ गया है। इस दिशा में काम करना जरूरी है अन्यथा भविष्य में हालत बहुत बिगड़ जाएगी। क्योंकि यहां की अधिकांश नदियां गैर हिमानी हैं जो सिर्फ वर्षा के जल पर ही निर्भर हैं।
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नदी से पहली लिफ्ट योजना 1948 में बनी
अल्मोड़ा। कुमाऊं विवि एसएसजे परिसर में भूगोल के विभागाध्यक्ष और एनआरडीएमएस के निदेशक प्रो. जेएस रावत के मुताबिक पहाड़ में ग्रेविटी फ्लो युग का प्रारंभ 1884 में अल्मोड़ा नगर से शुरू हुआ। जब नगर के लिए बल्ढोटी नामक स्थान से पेयजल योजना बनाई गई। 1931 में नगर से 28 किमी दूर स्याहीदेवी की पहाड़ी से ग्रेविटी आधारित पानी की योजना बनाई गई। जबकि पहली लिफ्ट योजना 1948 में कोसी से अल्मोड़ा के लिए बनाई गई। इसके तहत पंपों के जरिये पानी लिफ्ट किया गया। अब तो गांव-गांव में इस तरह की लिफ्ट योजनाओं का जाल फैला दिया गया है लेकिन जिन नदियों से यह योजनाएं बनाई गई हैं उनकी तरफ किसी का ध्यान नहीं है।
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