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गुड़ की भेली तोड़कर आज से बैठकी होली

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अल्मोड़ा। पौष माह के पहले रविवार की शाम कुमाऊं अंचल में खास मानी जाती है। इस दिन से बैठकी होली गायन की शुरुआत हो जाती है। गुड़ की भेली तोड़कर होली गायन की शुरुआत की जाती है। यह क्रम फागुन की होली (छरड़ी) तक निरंतर चलता रहता है। पौष माह में बसंत पंचमी तक केवल भक्ति, निर्वाण और देव स्तुति के ही पदों का गायन किया जाता है। द्वितीय चरण में बसंत पंचमी से रंगभरी होलियों का गायन शुरू हो जाता है। इधर गढ़वाल मंडल में बसंत पंचमी से फाग के गीत गाए जाते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है।
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कुमाऊं में होली गायन विधा का लंबा इतिहास माना जाता है। बताया जाता है कि चंद राजाओं के शासनकाल में भी बैठकी होली की गूंज सुनाई देती थी। माना यह भी जाता है कि कुमाऊं में होली गायन की परंपरा आज से तकरीबन तीन सौ साल पहले अपना स्थान बना चुकी थी। वरिष्ठ रंगकर्मी और होली गायक शिव चरण पांडे बताते हैं कि पौष माह में बसंत पंचमी तक केवल भक्ति, निर्वाण और देव स्तुति के पदों का ही गायन किया जाता है। शास्त्रीय संगीत की धुनों पर आधारित बैठकी होली मजीरा, हारमोनियम, सितार, आदि वाद्ययंत्रों के बीच काफी, जंगला काफी, खम्माज, श्याम कल्याण, सहाना, झिझौटी, जैजवंती, देश, परज, भैरवी आदि रागों में गाई जाती है। बैठकी होली को शास्त्रीय स्वरूप देने का योगदान उस्ताद अमानत हुसैन को जाता है। उन्हीं के द्वारा चांचर ताल की रचना भी की गई जो आज भी बैठकी होली में गाई जाती है। शिवचरण पांडे बताते हैं कि शुरुआत में स्व. गांगीराम वर्मा, स्व. शिवलाल वर्मा, स्व. मोहन लाल साह और चंद्र सिंह नयाल आदि ने होली बैठकों का आयोजन किया। आज भी पर्वतीय जिलों में विभिन्न जगहों पर पौष माह के पहले रविवार से होली गायन शुरू हो जाता है।
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