रानीखेत (अल्मोड़ा)। लोकसभा चुनाव में विभिन्न राजनीतिक दलों के नुमाइंदे खेती किसानी को मुद्दा बनाकर वोट बटोरने की जुगत में हैं। दूसरी तरफ क्षेत्र के दर्जनों गांवों में जंगली सूअरों और लावारिस जानवरों ने गेहूं की खड़ी फसल बरबाद कर दी है। जानवरों की डर से द्वाराहाट सहित तमाम इलाकों के ग्रामीणों ने खेतों की बुआई तक बंद कर दी है। ग्रामीण वोट मांगने वाले प्रत्याशियों से इस बाबत सवाल पूछने का मन भी बनाने लगे हैं।
खेती किसानी वर्षों से पर्वतीय क्षेत्र की रीढ़ रही है। ग्रामीणों की आजीविका का भी प्रमुख साधन रही है। लेकिन पिछले डेढ़ दशक में जंगली सूअरों, बंदरों और लावारिस जानवर खेतों पर कहर बनकर टूटे हैं। आतंक के चलते थापला सहित कई स्थानों पर ग्रामीणों ने खेतीबाड़ी करना तक छोड़ दिया है। दूसरी तरफ खेती किसानी को बचाने के लिए शासन प्रशासन की तरफ से पर्याप्त प्रयास नहीं किए जा रहे हैं।
लोकसभा चुनाव के लिए चुनावी सभाओं में खेती किसानी को भी राजनीतिक दलों के नुमाइंदे प्रमुख मुद्दा बनाते रहे हैं। पूर्व प्रधान सुरेश टम्टा, मकड़ों के पूर्व जिला पंचायत सदस्य राजेंद्र बिष्ट सहित तमाम लोगों ने बताया कि सुदूरवर्ती जालली, मासों, धमेड़ा, जालली, चौनिया, सनणें, मुनियाचौरा, पड्यूला सहित तमाम गांवों में जंगली सूअरों और लावारिस जानवरों का खासा आतंक बना हुआ है।
ग्रामीण कच्ची फसल काटने को मजबूर हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इस बार जो भी नुमाइंदे वोट मांगने आएंगे, पहले उनसे जंगली और लावारिस जानवरों के आतंक से निजात दिलाने संबंधी सवाल किए जाएंगे। ठोस आश्वासन के बाद ही अपने मत का इस्तेमाल किया जाएगा।