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ईको सेंसटिव जोन के विरोध में फिर ग्रामीण लामबंद

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अल्मोड़ा। बिनसर वन्य जीव विहार के सीमावर्ती गांवों को ईको सेंसटिव जोन में शामिल करने का एक बार फिर विरोध शुरू हो गया है। चार साल पहले भी इस मामले को लेेकर बड़ा प्रदर्शन हुआ था और बाद में वन विभाग ने ग्रामीणों के साथ कई दौर की बैठकें कर ईको सेंसटिव जोन को लेेकर उनकी समस्याओं को दूर करने का भी प्रयास किया था, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि बिनसर वन्य जीव विहार की भौगोलिक एवं वैधानिक स्थिति अन्य वन्य जीव विहारों से बिल्कुल अलग है और इस अभ्यारण्य की स्थापना के पूर्व से ही स्थानीय जनता बिनसर अभ्यारण्य को निरस्त करने की मांग को लेकर आंदोलन कर रही है।
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अल्मोड़ा से करीब 18 किमी की दूरी पर स्थित बिनसर वन्य जीव विहार की स्थापना 1988 में हुई थी, लेकिन स्थापना के समय से ही इसका विरोध हुआ था। तब समाजसेवी सोबन सिंह जीना ने अभ्यारण्य का सड़क से लेकर न्यायालय तक विरोध किया था। स्थापना के समय अभ्यारण्य का क्षेत्रफल 45.59 वर्ग किमी था, लेकिन बाद में इसे बढ़ाकर 47.07 कर दिया गया।

उत्तराखंड संसाधन पंचायत के संयोजक ईश्वर जोशी का कहना है कि वन विभाग ने क्षेत्रफल गैर कानूनी रूप से बढ़ाया है, जबकि नियमानुसार वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 की धारा 26 (3) के तहत बिना विधानसभा में संकल्प पारित किए किसी भी संरक्षित क्षेत्र की सीमा के साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि वन विभाग द्वारा संरक्षित क्षेत्र की सीमा विस्तार हेतु जरूरी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया जा रहा है। बिनसर अभ्यारण्य से लगे गांव के ग्रामीणों का कहना है कि वन विभाग द्वारा बिनसर अभ्यारण्य की सीमा से लगे घनी आबादी क्षेत्र को ईको सेंसटिव जोन घोषित किए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं और इसके लिए प्रमुख वन संरक्षक वन्य जीव द्वारा ग्रामीणों से सहमति ले ली जाने की झूठी खबरें भी फैलाई जा रही हैं। जिससे ग्रामीणों में भारी रोष है।
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