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भूकंप से बचाव के लिए हिमालयी मिशन ने सुझाया बांस के सस्ते और टिकाऊ मकानों का मॉडल...

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अल्मोड़ा। भूकंप की दृष्टि से हिमालयी राज्य उत्तराखंड जोन पांच में आता है। वैज्ञानिकों का दावा है कि संचित ऊर्जा के कारण हिमालयी राज्यों में आठ रिएक्टर का विनाशकारी भूकंप कभी भी आ सकता है। केंद्र सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन की अल्मोड़ा इकाई ने विकल्प के तौर पर बांस के सस्ते और टिकाऊ मकानों का मॉडल सुझाया है। अगरतला में इस परियोजना को सफलता भी हासिल हो चुकी है। मात्र 80 हजार रुपये में भूकंप रोधी बांस का मकान तैयार किया गया है।

संभावित भूकंप को देखते हुए वैज्ञानिक इससे होने वाले नुकसानों को कम करने के लिए समय समय पर अनेक उपाय सुझाते रहे हैं।। राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन की अल्मोड़ा परियोजना अनुश्रवण इकाई द्वारा वन अनुसंधान केंद्र अगरतला को दी गई बॉस के सस्ते और टिकाऊ मकानों के मॉडलों की लघु परियोजना इकाई को कार्य में सफलता हासिल हुई है। क्षेत्र में लोगों की जरूरतों को देखते हुए बॉस के लठ्ठों को चीरकर अन्य भवन सामग्री तैयार की गई और मॉडल के तौर पर क्षेत्र में बॉस के आठ भवन बनाए गए।
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परियोजना में त्रिपुरा के ग्रामीण विकास विभाग और आपदा प्रबंधन विभाग का भी सहयोग लिया गया। परियोजना प्रमुख पवन के कौशिक के अनुसार 400 वर्ग फीट में बने भवन की लागत मात्र 80 हजार रुपये आती है और लगातार देखरेख करने पर यह पचास साल से अधिक समय तक टिकाऊ रह सकता है। बॉस के बनाए गए भवन अत्यधिक आकर्षक और टिकाऊ हैं।
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भारतीय हिमालयी क्षेत्रों में स्थानीय संसाधनों का सतत उपयोग और उसे आजीविका से जोड़ने का यह अच्छा उदाहरण है। उत्तराखंड की तरह त्रिपुरा भी भूकंप की दृष्टि से जोन पांच में आता है। और यहां बॉस के भवनों का निर्माण सफल रहा है। इस प्रकार के सुरक्षित भवनों के मॉडलों को देश के अन्य राज्यों में भी उपयोग किया जा सकता है। इं. किरीट कुमार, नोडल अधिकारी, राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन।
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