अल्मोड़ा। अल्मोड़ा की ऐतिहासिक जेल में आजादी के आंदोलन का महान इतिहास समाया हुआ है। आजादी का आंदोलन जब निर्णायक दौर पर था तो 1930 से 1945 के बीच देश के कई महान नेताओं को इस जेल में रखा गया। पंडित जवाहर लाल नेहरू दो बार इस जेल में लाए गए और अंतिम बार 15 जून 1945 को पंडित नेहरू अल्मोड़ा जेल से ही रिहा हुए।
आजादी के बाद से हर साल नौ अगस्त को अल्मोड़ा की ऐतिहासिक जेल में स्थित नेहरू वार्ड में अगस्त क्रांति की वर्षगांठ मनाई जाती है। विडंबना है कि जिस जगह पर रहकर देश के सर्वोच्च नेताओं ने राष्ट्र की आजादी के लिए संघर्ष किया उस पवित्र इमारत में आज भी हत्या, लूट, बलात्कार जैसे अपराधों में लिप्त रहने वाले अपराधियों को रखा जाता है। इस ऐतिहासिक जेल को संरक्षित स्मारक बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी मिल चुकी है, लेकिन नई जेल का निर्माण अभी तक शुरू नहीं हुआ है।
आजादी के आंदोलन के दौरान अल्मोड़ा की ऐतिहासिक जेल में पंडित जवाहर लाल नेहरू दो बार कैद रखे गए। 1930 से 1945 के दौरान देश के कई महान क्रांतिकारियों को अल्मोड़ा जेल में ठूंस दिया गया। खान अब्दुल गफ्फार खान, पंडित गोविंद बल्लभ पंत, आचार्य नरेंद्र देव, कामरेड पूरन चंद्र जोशी, सरला बहन, बद्री दत्त पांडे सहित कई राष्ट्रीय नेता काफी समय तक इस जेल में रहे।
उस दौर में काठगोदाम रेलवे स्टेशन से अल्मोड़ा तक सीधी सड़क भी नहीं थी ऐसे में देश के तमाम हिस्सों में आंदोलन अधिक भड़कने पर तेज तर्रार नेताओं को अल्मोड़ा की एकांत जेल में डाल दिया जाता था।
पंडित जवाहर लाल नेहरू पहली बार 28 अक्तूबर 1934 से तीन सितंबर 1935 तक इस जेल में रहे। इस दौर में पंडित नेहरू की पत्नी कमला नेहरू बीमार थीं और उन्हें स्वास्थ्य लाभ के लिए नैनीताल के निकट स्थित भवाली सेनिटोरियम में रखा गया था। उनकी बीमारी को देखते हुए पंडित नेहरू को नैनी से अल्मोड़ा जेल स्थानांतरित किया गया। पंडित नेहरू तीन सप्ताह में एक बार कमला नेहरू से मिल सकते थे। इस ऐेतिहासिक जेल को संरक्षित स्मारक बनाने और जेल को अन्यत्र शिफ्ट करने के लिए करीब 10 साल पहले जिला प्रशासन ने शासन को प्रस्ताव भेजा था। इस प्रस्ताव को मंजूरी मिल चुकी है, लेकिन जेल को अन्यत्र शिफ्ट करने के लिए अभी तक नई जेल का निर्माण शुरू नहीं हुआ है।