अल्मोड़ा। राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ ने आरोप लगाया कि कि राज्य सरकार द्वारा संचालित जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों में नियुक्ति एनसीटीई के मानकों के अनुसार नहीं की गई है। जिससे संस्थानों में चल रहे प्रशिक्षणों पर प्रश्रचिन्ह लगा हुआ है। जबकि एनसीटीई एक्ट में डायट में नियुक्ति के लिए 55 प्रतिशत अंकों के साथ परास्नातक और शिक्षा में 55 प्रतिशत अंकों के साथ स्नातकोत्तर उपाधि होना अनिवार्य है। वक्ताओं ने शिक्षकों के प्रशिक्षण को राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद एनसीटीई द्वारा अमान्य घोषित करने पर भी सवाल उठाए हैं।
महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष प्रो. विजय पांडे की अध्यक्षता में हुई बैठक में वक्ताओं ने कहा कि शासन प्रशासन की लचर व्यवस्था के चलते हजारों शिक्षकों की प्रशिक्षण योग्यता सवालों के घेरे में आ गई है। शिक्षकों के प्रशिक्षण को एनसीटीई द्वारा अमान्य घोषित करने से हजारों बीएड योग्यताधारी एक झटके में अप्रशिक्षित की श्रेणी में आ गए हैं जबकि इस प्रकरण में इन शिक्षकों का कोई दोष नहीं है, क्योंकि इनके द्वारा प्राप्त प्रशिक्षण उत्तराखंड के राजकीय संस्थानों से विधि सम्मत ढंग से प्राप्त किया गया है। प्रदेश सह संगठन मंत्री शिव नारायण सिंह ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार द्वारा संचालित जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों में नियुक्ति एनसीटीई के मानकों के अनुसार नहीं की गई है।
उन्होंने कहा कि डायटों में वरिष्ठ प्रवक्ता के 90 प्रतिशत पद रिक्त हैं और जो 10 प्रतिशत कार्यरत भी हैं उनमें अधिकांश अपूर्ण योग्यताधारी हैं। प्रदेश अध्यक्ष प्रो. विजय पांडे ने कहा कि एनसीटीई एक्ट 1993-95 में स्पष्ट प्रावधान है कि डायट परिसर में नियुक्तियां केवल पूर्णकालिक और स्थायी होनी चाहिए, जबकि हमारे राज्य में डायट का अभी तक अपना ढांचा ही लागू नहीं हो सका है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में डायटों में केवल माध्यमिक शिक्षकों से काम चलाऊ व्यवस्था के तहत प्रशिक्षण कार्य संपादित कराया जा रहा है और ऐसे शिक्षक प्रशिक्षण का जिम्मा संभाले हुए हैं जिन्हें शोध प्रशिक्षण से कोई वास्ता नहीं है। बैठक में रमेश चंद्र सिंह धपोला, जगदीश पांडे, हरेंद्र सिंह बिष्ट, दीपक वर्मा, राम चंद्र सिंह रौतेला, मनोज पाठक, जीतेंद्र पुनेठा, रामशब्द यादव, हेमंत जोशी, प्रो. हरीश जोशी मौजूद थे।