अल्मोड़ा। इतिहासकार और पद्मश्री प्रो. शेखर पाठक ने कहा कि पहाड़ में खेती की जमीन केवल छह प्रतिशत है। यदि बची-खुची जमीन भी चली गई तो पहाड़ की पहचान खत्म हो जाएगी। सरकार को ऐसी नीति बनानी चाहिए जिससे यहां के लोगों की पहचान बनी रहे। उलोवा के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता स्व. डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट के जन्मदिन पर राजकीय संग्रहालय में आयोजित कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि उन्होंने यह बात कही। प्रो. पाठक ने कहा कि उत्तराखंड की राजनैतिक, सामाजिक चेतना में डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
उन्होंने कहा कि एक दौर में एक राष्ट्रीय पार्टी ने उन्हें दल में शामिल करने का काफी प्रयास किया, लेकिन प्रलोभनों से दूर रहकर उन्होंने जनपक्ष में खड़े रहना अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। उन्होंने कहा कि पानी, नदियां, खेती, पहाड़ के ज्वलंत मुद्दे हैं जिसमें जनता की हिस्सेदारी प्रमुख है। गोष्ठी में बतौर मुख्य वक्ता विचार व्यक्त करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. कपिलेश भोज ने कहा कि पहाड़ में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी का दंश यहां के लोग भुगत रहे हैं।
उन्होंने कहा कि 70 के दशक में देश में जनसंघर्ष चरम पर था तब अल्मोड़ा में भी डॉ. बिष्ट की अगुवाई में आंदोलन हुए। वरिष्ठ आंदोलनकारी पीसी तिवारी ने कहा कि डॉ. बिष्ट ने 1975 में स्टार पेपर मिल के प्रलोभन को छोड़ते हुए उसके खिलाफ संघर्ष का बिगुल छेड़ दिया था। पालिकाध्यक्ष प्रकाश चंद्र जोशी ने कहा कि डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट की उत्तराखंड यात्राओं से एक राजनैतिक चेतना विकसित हुई। अध्यक्षता करते हुए प्रो. देव सिंह पोखरिया ने कहा कि डॉ. बिष्ट जो विचार समाज के लिए छोड़ गए हैं उस पर चिंतन प्रवाह हमेशा बना रहना चाहिए।
कार्यक्रम संयोजक रेवती बिष्ट ने सभी का आभार जताया। संचालन करते हुए उलोवा के पूरन चंद्र तिवारी ने कहा कि जल्द ही एक बड़ा सम्मेलन आयोजित किया जाएगा। कार्यक्रम में जगत रौतेला, दयाकृष्ण कांडपाल, हरीश मेहता, अजय मेहता, मो. हारिस, जंगबहादुर थापा, शमशेर जंग गुरंग, रमाशंकर नैलवाल, उदय किरौला, आनंद सिंह ऐरी, जयमित्र बिष्ट, अजय मित्र बिष्ट, हरीश जोशी, शिवदत्त पांडे, डीके जोशी, आशीष जोशी आदि मौजूद रहे।