रानीखेत (अल्मोड़ा)। एक तरफ गांव-गांव को विकास की मुख्य धारा से जोड़ने के दावे होते हैं, लेकिन सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में यह दावे खोखले साबित हो रहे हैं। तहसील के सुदूरवर्ती भिटारकोट गांव में बरसात के दौरान देवराड़ गधेरा उफान पर आ जाता है, जिसके चलते ग्रामीण जानवरों के लिए चारा नहीं जुटा पाते, लेकिन इस गधेरे में आज तक पैदल पुलिया का निर्माण नहीं हो सका है। जबकि गधेरे से भिटारकोट, कुसलीबी, बगथल, कफाड़ सहित कई गांवों के लोग जंगल जाते हैं, प्रख्यात ऐड़ाद्यो मंदिर को जाने वाला पैदल मार्ग भी इसी गधेरे से होकर गुजरता है।
रानीखेत से लगभग 40 किमी की दूरी पर स्थित भिटारकोट गांव क्षत्रीय और अनुसूचित बहुल गांव है। यहां तकरीबन 150 परिवार निवास करते हैं। ग्रामीण जानवरों के लिए चारा जुटाने प्रतिदिन मेल्टा के जंगल पर निर्भर हैं। जबकि कफाड़ सहित कई गांव के स्कूली बच्चे भी पैदल स्कूल जाते हैं।
बरसात के समय देवराड़ गधेरा उफान पर रहता है। अन्य वैकल्पिक मार्ग नहीं होने के कारण इन दिनों लोगों की दिनचर्या प्रभावित हो जाती है। अमर उजाला की टीम ने जब गांव में जांच पड़ताल की तो ग्रामीणों का दर्द छलक उठा। चार साल पूर्व बरसात के दौरान गधेरा पूरे उफान पर था।
कफाड़ निवासी आनंद राम ने बताया कि वह गधेरे में बह गए, जिसके चलते उन्हें अब सुनाई नहीं देता। दया नेगी ने कहा कि देवराड़ में बमुश्किल 12 से 15 मीटर स्पान का पुल बनना है, लेकिन आज तक यह नहीं बन सका। मंजू नेगी ने बताया कि प्रतिदिन जंगल से लकड़ी और चारा बीनने जाना पड़ता है, बरसात के दौरान गधेरा उफान पर होता है जिससे सारे कार्य छोड़ने पड़ते हैं।
रूपा नेगी ने बताया कि यदि पुल बन जाता था बरसात में उन्हें काफी सहूलियत होती। भिटारकोट के अलावा कुलसीबी, बगथल, कफाड़, नैड़ी सहित तमाम गांव के लोग यहीं से जंगल जाते हैं और ऐड़ाद्यो तथा सोमेश्वर के लिए पैदल निकलते हैं।