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125 परिवारों का गांव अब हुआ वीरान

Mon, 26 Sep 2016 11:01 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, अल्मोड़ा।
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गांव के उजड़े घर। - फोटो : अमर उजाला
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 राज्य बनने के बाद खुशहाली का सपना देखने वाले ग्रामीण तमाम अभावों के चलते अपनी थाथ से विमुख हो रहे हैं। पलायन रूपी घुन ने गांवों की तस्वीर ही बदलकर रख दी है, इसके बावजूद नीति निर्धारकों की तंद्रा नहीं टूट रही।  भिकियासैंण विकासखंड का सोली गांव भी पलायन की जबरदस्त मार झेल रहा है। जंगली जानवरों का यहां दिन दहाड़े आतंक है, जिस कारण 125 परिवारों में से गांव में अब सिर्फ 15 परिवार शेष रह गए हैं। सूनी पड़ी बाखलियां, जीर्ण-शीर्ण मकान पलायन के दर्द को बयां कर रहा है।
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 भिकियासैंण मोटर मार्ग पर सिनौड़ा से दो किमी की पैदल दूरी पर स्थित सोली गांव जंगल से घिरा हुआ है। जिस कारण यहां दिन दहाड़े तेंदुआा घूमता है। बंदर, सुअरों के आतंक से खौफजदा ग्रामीण अब खेतीबाड़ी से विमुख हो रहे हैं। यह क्षेत्र फल उत्पादन के लिए मशहूर है। यहां आम की पैदावार अत्यधिक होती है, लेकिन सड़क नहीं होने के कारण फलों को समय पर बाजार नहीं मिल पा रहा है। प्रधान लक्ष्मण सिंह ने बताया कि पूर्व में यहां 125 परिवार रहते थे। 10 साल पहले तक 65 परिवार थे, लेकिन वर्तमान में सिर्फ 15 परिवार बचे हुए हैं, अधिकांश घरों में बुजुर्ग रहते हैं। गांव में कई खाली भवन जीर्ण-शीर्ण हालत में हैं। यदि कोई बुजुर्ग गांव में बीमार हो गया तो उसे अस्पताल ले जाने के लिए भी लोग उपलब्ध नहीं हैं। पूर्व में यह गांव काफी खुशहाल था। अनाज और फल उत्पादन के माध्यम से लोग आजीविका चलाते थे, लेकिन धीरे-धीरे अभाव बढ़ते ही गए।

राज्य बनने के बाद फिर खुशहाली की उम्मीद थी, लेकिन सबसे अधिक निराशा राज्य निर्माण के बाद ही हुई है। सरकारों ने बारी बारी से गांवों की उपेक्षा की है। नशा हटाओ, पलायन रोको अभियान को लेकर गांव पहुंचे अभियान के संयोजक डा. प्रमोद नैनवाल ने बताया कि सोली गांव में घुसते ही पहले तेंदुए के दर्शन हुए। उपेक्षा के चलते गांवों की हालत खराब है। मनरेगा कार्यों के लिए गांव में अब श्रमिक नहीं मिल रहे हैं। 
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