लगातार दो दिनों से आसमान से आफत बरस रही थी। बारिश थमने के आसार नहीं दिख रहे थे। बावजूद इसके केदारनाथ धाम में श्रद्धालुओं का आना जारी था। केदारपुरी में चहल-पहल बनी हुई थी। रोज की तरह केदारनाथ मंदिर में सांध्यकालीन पूजा की तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा था।
करीब सात बजे मैं मंदिर में परंपरागत वेशभूषा में प्रविष्ट हुआ। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच बाबा केदार की अर्चना शुरू की गई। पूजा के बाद मैं अपने आवास पर चला गया। तभी मंदिर के पश्चिमी भाग से आए मलबे में शंकराचार्य समाधि और भारत सेवा आश्रम की धर्मशाला बह गई। इसके अलावा कई अन्य लॉज भी इसकी चपेट में आ गए।
पहले से थी अनहोनी की आशंका
रात डेढ़ बजे भगवान का अभिषेक के बाद अन्य पूजा संपन्न की और भगवान को बालभोग लगाया। दैनिक पूजा के बाद साढ़े पांच बजे अपने आवास पर चला गया। अनहोनी की आशंका को देखते हुए मैने भोगमूर्ति अपने पास ही रखी थी। एक घंटे बाद भोग मूर्ति को लेकर फिर मंदिर आया।
गर्भगृह में घुस गया था पानी
सुबह आठ बजे लगभग तेज आवाज हुई। मंदाकिनी का पानी तेज गति से मंदिर के पूर्वी दरवाजे से सभा मंडप होते हुए गर्भगृह में आ गया। लेकिन एक चमत्कार सा हुआ। सैलाब का पानी गर्भगृह में भगवान के लिंग का जलाभिषेक और परिक्रमा करके बाहर निकल गया। इसके बाद सफे द रेत से मंदिर अट-पट गया।
मंदिर के भीतर जलस्तर पांच फीट तक बढ़ गया। तभी मंदिर का पश्चिमी द्वार खुला और मलबा बाहर निकलने लगा। इस बीच मुझे लगा कि कहीं भगवान की भोगमूर्ति भी न बह जाए। मैंने उसको अपने हाथों में उठा लिया।
(भोग मूर्ति अभिमंत्रित होती है और जब मंदिर के कपाट शीतकाल के लिए बंद किए जाते हैं, तो भगवान की उत्सव डोली के साथ इसी भोग मूर्ति को शीतकालीन पूजा के लिए ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ में लाया जाता है)। भोगमूर्ति के सुरक्षित रहने से सदियों से चली आ रही परंपरा भी अक्षुण्ण रही।
आठ घंटे मलबे में रहकर बचा ली मृर्ति
फिर देखते ही देखते पानी का स्तर बढ़ता गया। पानी जब गर्दन के पास पहुंचा, तो केवल भोगमूर्ति को सुरक्षित रखने का ख्याल ही मन में था। सुबह आठ से शाम साढ़े चार बजे तक मलबे में ही रहा। इस दौरान मैं दिनभर महामृत्युंजय जाप करता रहा।
जैसी स्थितियां थीं, उसमें जीवित रहने की संभावना बहुत कम थी, लेकिन बाबा केदार ने परंपरा को खत्म होने से बचा लिया। तीन दिन तक इधर-उधर भटकता रहा। किसी से कोई संपर्क नहीं हो पा रहा था। कुछ नहीं सूझ रहा था। बाद में भगवान की भोगमूर्ति के साथ गुप्तकाशी आ गया।
(जैसा केदारनाथ धाम के प्रधान पुजारी वाधेश लिंग ने विजय लक्ष्मी भट्ट को बताया)