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आपदा के वक्त कहां हैं उत्तराखंड के दो हजार एनजीओ?

Sat, 29 Jun 2013 11:01 AM IST
उत्तरकाशी/ब्यूरो
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कहा जाता है कि अकेले उत्तराखंड में दो हजार से अधिक एनजीओ काम कर रहे हैं। केवल काम ही नहीं बल्कि फलफूल रहे हैं। मगर इस संकट की घड़ी में दूर-दूर तक एनजीओ नजर नहीं आ रहे हैं।
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अगर छुटपुट कहीं नजर भी आते हैं तो केवल सुविधाजनक स्थल या फिर कस्बों में।

उत्तराखंड आपदा की विशेष कवरेज

दूर दराज के इलाके और विपत्ति में फं से लोगों तक पहुंचने के लिये किसी एनजीओ की अपेक्षा नहीं की जा सकती। कुछ एनजीओ हेलीकाप्टर में सैर सपाटे की फिराक में दिखे तो कुछ के लिए लोगों की मदद के बजाय अपना प्रचार ज्यादा अहम था।

नजर नहीं आए एनजीओ
15 जून को राज्य के अलग-अलग इलाकों में हुई महाआपदा के बाद उम्मीद थी कि पिछले कुछ सालों से सक्रिय एनजीओ राहत कार्यों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेंगे, लोगों तक अपनी मदद पहुंचाएंगे।
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गंगा घाटी में पिलंग स्याबा, सिल्ला, जौडाउ जैसे दूरदराज के गांव तक पहुंचने की बात तो दूर वह उत्तरकाशी के निकट के ग्रामीण इलाकों में भी नजर नहीं आए।

जहां अच्छेखासे राहत शिविर चल रहे हैं उसी के समीप अपने पोस्टर टांगे हुए हैं। राज्य में कई तरह के एनजीओ काम कर रहे हैं। तीस से चालीस प्रतिशत एनजीओ लोगों की सहायता के लिए बने हैं। लेकिन ऐसे समय जब उनको बहुत सक्रिय होना था वह नजर नहीं आ रहे हैं।

केवल सहायता शिविरों में दिखे
एनजीओ जनपद मुख्यालय के निकटवर्ती क्षेत्रों राहत बांटने तक सीमित है, जबकि ये प्रभावितों को सूचीबद्ध कर उन्हें मदद कर सकते थे।

आर्ट ऑफ लिंविंग और होप फांउडेशन जैसी संस्थाओं के गुरू और प्रबंधक तो दिखे लेकिन ऐसी संस्थाओं से जुडे़ कार्यकर्ताओं को ऐसी मुहिमों में नहीं लाया गया। ये लोग केवल सहायता शिविरों में दिखे।

होप फाउंडेशन से जुडे़ ठाकुर शमसेर सिंह का कहना है कि बाहर के कुछ एनजीओ तो दिखते भी हैं, लेकिन स्थानीय एनजीओ सिरे से नदारद हैं। इन में कई तो काफी कुछ कर सकने की स्थिति में हैं। लेकिन वे निष्क्रिय पड़े हैं।
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चिन्यालीसौड़, गणेशपुर, बगोरी, हर्षिल, मनेरी में गांवों के लोगों ने फंसे लोगों के रहने खाने से ले कर हर तरह से मदद की।
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