पंद्रह जून को सब कुछ सामान्य था। गौरीकुंड में यात्रियों की भारी भीड़ थी। होटल और गेस्ट हाउस पैक थे। यात्रियों को कमरे नहीं मिल रहे थे।
देर शाम बारिश शुरू हो गई। और अगले दिन 16 की रात तो मिनटों में सब कुछ तबाह हो गया। गौरीकुंड में टिके करीब चार हजार लोगों ने दौड़ते-भागते गौरीगांव पहुंचकर जान बचाई।
होटल भी बाढ़ में समा गया
गौरीगांव निवासी राम गोस्वामी का गौरीकुंड स्थित देवलोक होटल भी मंदाकिनी की बाढ़ में समा गया। गोस्वामी इस विनाशलीला के प्रत्यक्षदर्शी हैं। वह बताते हैं कि यात्रा सीजन चरम पर होने से गौरीकुंड यात्रियों से पूरी तरह गुलजार था। 15 जून की शाम से बारिश शुरू हो गई।
उत्तराखंड आपदा की विशेष कवरेज
16 जून की सुबह मौसम खराब होने पर घोड़े-खच्चरों की आवाजाही बंद कर दी गई। दोपहर में बारिश कुछ कम हुई पर फिर शाम चार बजे से पानी बढ़ गया। नदी किनारे होटलों में ठहरे कई यात्री कमरे खाली कर चले गए। वह भी अपना होटल खाली कराकर चचेरे भाई और कुछ होटल कर्मियों को साथ लेकर अपने घर गौरी गांव निकल गए।
तब मंदाकिनी उफान पर थी। उनके गांव पहुंचने तक तबाही शुरू हो गई थी। गौरीकुंड में नदी तट पर स्थित होटल एक-एक कर गिर-गिर रहे थे। उन्होंने भारत सेवाश्रम को जलमग्न होते देखा। इस भवन में 260 कमरे थे। अंधेरा होने पर कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, पर डरावनी रात में जोर के धमाके पूरी विनाशलीला का संकेत दे रहे थे।
मंदाकिनी की भेंट चढ़ गया सब कुछ
मिनटों में ही सब कुछ मंदाकिनी की भेंट चढ़ गया। गौरीकुंड में टिके करीब चार हजार लोगों ने दौड़ते-भागते किसी प्रकार गौरी गांव पहुंचकर जान बचाई। गांव के लोगों ने रात में उन्हें खाना खिलाने के साथ उनके लिए कपड़ों की व्यवस्था की। पूरी रात दहशत में काटने के बाद 17 जून को यह डर और बढ़ गया।
अभी भूला नहीं है तबाही का मंजर
करीब तीन बजे आसमान में उड़ते एक हेलीकाप्टर को देखने पर सांस में सांस आई। बकौल गोस्वामी, लगा हेलीकाप्टर हमें बचाने आया है, पर वह केदारनाथ को चला गया।18 को मौसम खुलने पर दस-बारह हेलीकाप्टर उड़ते दिखाई देने पर कुछ और राहत मिली।
गोस्वामी ने बताया कि 17 जून को तमाम लोग गौरीकुंड से सोनप्रयाग के लिए निकल पड़े तो बीच में एक बड़ी चट्टान के गिर जाने से कई लोगों की मौत हो गई। इसी बीच आठ-दस जवान वहां पहुंच गए। उन्होंने रस्सियों के सहारे कई यात्रियों को सुरक्षित निकाला।