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जानिए, यूपी में सत्ता के ‘लाडलों’ ने कितनी बार रौंदी अफसरशाही

Thu, 01 Aug 2013 01:14 AM IST
पुनीत शर्मा
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आईएएस दुर्गा का मामला नया नहीं है। कानून का पालन कराने की कोशिश में कई बार माफिया, दबंगों और सत्ता के करीबियों के आगे अपने आत्मसम्मान को ‘गिरवी’ रखना पड़ा है अफसरों को।
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या तो झुक गए और जो नहीं झुके उन्हें तबादले की ठोकर झेलनी पड़ी है। ऐसे तमाम पुराने आईएएस आईपीएस अफसर हैं जिनके सामने दुर्गा प्रकरण जैसे हालात आए...हम उनके अनुभवों को साझा कर यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि किस तरह कई बार अफसरों को बगैर दोष सजा काटनी पड़ी है।

कॉलगर्ल को पकड़ने में हटे थे विक्रम सिंह
डीजीपी के पद से रिटायर होने वाले विक्रम सिंह वर्ष 1988 में आगरा के एसएसपी थे। वहां एक हाईप्रोफाइल कालगर्ल रैकेट का खुलासा किया। इसमें शहर के कई बड़े लोगों के नाम सामने आए। दबाव बना था इन लोगों के नाम निकाल दिए जाएं। शासन तक से प्रेशर बन रहा था। मगर नाम नहीं निकाला। इस पर विक्रम सिंह का आगरा से तबादला कर दिया गया था। कानपुर में कुछ सफेदपोश लोगों पर कार्रवाई की गई तो 1991 में कानपुर से तबादला हुआ। एआईजी ट्रेनिंग बनाया गया था।
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एसओ को गुनहगार न बनाने पर हुआ तबादला
डीजी ट्रेनिंग के पद से रिटायर होने वाले बाबूलाल यादव वर्ष 1981 का वाकया बताते हैं। वह बरेली में एडिशनल एसपी थे। वहां सिरौली के थाने में एक एसओ पर आरोप लगा था कि उसने स्कूल वालों के साथ दुर्व्यवहार किया है। मामला सियासी था और कुछ बड़े लोगों से जुड़ा था। एसएसपी ने मुझे जांच सौंपी। मुझ पर दबाव एसओ को दोषी ठहराने का था। मगर मैने जो सही पाया वह किया। तत्काल ट्रांसफर कर दिया गया।

जनप्रतिनिधियों ने बनाया था गैरकानूनी काम का दबाव
डीजी पुलिस अकादमी के पद से रिटायर होने वाले उदयन परमार वर्ष 1988 में हरदोई में एसपी थे। वहां के जन प्रतिनिधि लगातार गैरकानूनी काम कराने का दबाव बनाते थे। थानेदारों के तबादलों में भी हस्तक्षेप कर रहे थे। कुछ जमीनों पर कब्जे के मामले भी सामने आ रहे थे। शासन में शिकायत लेकर पहुंच गए थे विधायक। मेरा तबादला हरदोई से कानपुर के लिए कर दिया गया था।

माफिया के इशारे पर हो गया था ट्रांसफर
आरबी सिंह वर्ष 1991 में अंबेडकरनगर में एडिशनल एसपी थे। यहां माफियाओं के खिलाफ अभियान चलाकर कार्रवाई की गई थी। अवैध खनन रोका गया। पच्चीस से भी ज्यादा लोगों को गिरफ्तार करके जेल भेजा गया। हफ्ते भर तो अभियान चला लेकिन बाद में उच्चाधिकारियों ने ही दबाव बनाना शुरू कर दिया था। जब अभियान नहीं रोका तो कुछ माफियाओं ने मिलकर उनका तबादला करा दिया। पीएसी में भेजा गया था।

डीजीपी नहीं रुकवा पाए थे इंसपेक्टर का ट्रांसफर
ज्योति स्वरूप पांडेय उस वक्त उत्तराखंड में एडीजी प्रशासन थे। वर्ष 2005 में देहरादून में छात्र संघ चुनाव हुआ था। विजयी ग्रुप ने जुलूस निकाला। खाना खाने के लिए एक होटल में घुस गए। वहां दबंगई दिखाई। पुलिस पहुंची और बल प्रयोग किया। इंसपेक्टर ने बहुत अच्छा काम किया था। लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री ने उसका ट्रांसफर कर दिया। खुद डीजीपी कंचन भट्टाचार्य ने लिखकर दिया कि इंसपेक्टर ने एक बड़ा बवाल टाला है। मगर ट्रांसफर रुका नहीं।
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