काशी विश्वनाथ मंदिर के मूल स्वरूप को संरक्षित करने और परंपराओं को बचाने के लिए नए सिरे से प्रयास किए जाएंगे। दर्शन-पूजन की पुरानी परंपराओं को फिर से लागू किया जाएगा।
इन परंपराओं की जानकारी के लिए विद्वानों की कमेटी गठित कर दी गई है। इस कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर अब दर्शन की प्रक्रिया आसान बनाने के साथ ही रुद्राभिषेक और आरती के तौर-तरीकों का निर्धारण होगा।
बाबा विश्वनाथ दरबार को पुराने स्वरूप में लाने के लिए ढाई सौ साल पुरानी परंपराओं का अध्ययन कराया जा रहा है। इसके लिए काशी विद्वत परिषद की मदद ली जा रही है।
ताकि सनातनी परंपराओं के अनुरूप मंदिर में दर्शन, पूजा और आरती की व्यवस्था की जा सके। अभी रात को दो बजे ही मंगला आरती के लिए पुजारी मंदिर पहुंच जाते हैं और 2:30 बजे से आरती दर्शन के लिए श्रद्धालुओं को मंदिर में प्रवेश कराया जाने लगता है।
कहा जा रहा है कि पांच सितारा होटलों में रुकने वाले रईसों, पूंजीपतियों की सुविधा को ध्यान में रखकर इस व्यवस्था को चलाया जा रहा है, जबकि इससे शुचिता, शुद्धता प्रभावित होती है।
मंदिर का अध्ययन कर रहे वास्तुविद ऋषभ जैन का कहना है कि एक साथ 15-20 हजार श्रद्धालुओं को मंदिर में प्रवेश कराने की आसान व्यवस्था बनाने पर विचार किया जा रहा है।
कोशिश यही है कि मंदिर का मूल स्वरूप संरक्षित किया जा सके। वास्तुविद अनिल किंजावडे़कर ने भी पुराने स्वरूप को बचाए रखने पर जोर दिया है।