थैलेसीमिया ग्रसित कुल 500 बच्चों में करीब 150 से अधिक ऐसे बच्चे हैं, जिनको बेहतर जीवन जीने के लिए हर सप्ताह खून बदलना पड़ता है। 200 बच्चों को 15 दिन में जबकि अन्य बच्चों को जरूरत के हिसाब से महीने में एक बार खून बदला जाता है। आईएमए के सचिव डॉ. एके त्रिपाठी का कहना है कि ब्लड बैंक से नियमानुसार इससे पीड़ित बच्चों को बिना डोनेशन और बिना फीस के(बिना रक्तदान करवाए और बिना किसी फीस के) खून दिया जाता है।
बच्चों के लिए रिजर्व रखना पड़ता है स्टॉक
मंडलीय अस्पताल कबीरचौरा ब्लड बैंक में तैनात जितेंद्र पटेल का कहना है कि औसतन करीब 40 थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों को खून दिया जाता है। इसमें पॉजिटिव तो किसी तरह मिल जाता है लेकिन प्राय: निगेटिव ग्रुप को लेकर समस्या आती रहती है। इन बच्चों का इलाज न रूके, इसलिए इनके लिए स्टॉक रिजर्व रखना पड़ता है।
थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों के इलाज के लिए ब्लड बैंक में अलग-अलग ग्रुपों का ब्लड होना जरूरी होता है। यह तभी होगा जब लोग स्वैच्छिक रक्तदान के लिए कदम आगे बढ़ाएंगे। विशेषकर निगेटिव ग्रुप वालों को इसके लिए आगे आना चाहिए, जिससे कि बच्चों का बेहतर इलाज होता रहे। -प्रो.एसएन संखवार, निदेशक, आईएमएस बीएचयू