मंजिल उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है। पंख से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है... यानी जज्बा और जुनून हो तो इंसान लाख लाचारियों के बावजूद मंजिल हासिल कर ही लेता है। महिला चित्रकार पूनम राय और अंजुम मलिक इसकी नजीर हैं। दृढ़ निश्चय के बल पर शारीरिक अक्षमता को मात देते इस महिला चित्रकार ने कला परिकल्पना की ऊंची उड़ान की बदौलत जिंदगी की राह आसान बनाई है।
बीएचयू से फाइन आर्ट्स की पढ़ाई करने वाली पटना निवासी पूनम को 1997 में उनकी ससुराल में छत से गिरा दिया गया था। उनकी रीढ़ की हड्डी में ऐसी चोट आई कि उनके दोनों पैर निष्क्रिय हो गए। अब वह वॉकर के सहारे चलती हैं लेकिन उनका कहना है कि इंसान मन और दिमाग से दिव्यांग होता है। कुछ वक्त बाद पांडेयपुर में उन्होंने बीआर स्कूल की स्थापना कर वहां गरीब परिवार के बच्चों, महिलाओं को कला की पढ़ाई शुरू कर दी।
आजकल वह पेंटिंग के बल पर पैसे के साथ ही शोहरत भी कमा रही हैं। मोढ़ैला में मेहता आर्ट गैलरी की कला प्रदर्शनी में उनकी पेंटिंग प्रदर्शित की गई है। इसी तरह दिल्ली की दिव्यांग अंजुम मलिक के दोनों पैर निष्क्रिय हैं। वह चल नहीं सकतीं लेकिन कला के हुनर ने उनकी जीने की राह आसान कर दी है। उनकी चित्रकला को देश भर में पसंद किया जा रहा है। प्रकृति प्रेम, पर्यावरण और स्त्री विमर्श पर उनके चित्रों को खूब सराहना मिली है।
इंसान शरीर से नहीं दिल-दिमाग से दिव्यांग होता है। इसे साबित कर दिखाया है नेवादा के क्रिकेटर सुबोध राय ने। जन्म के वर्ष भर बाद पोलियो के शिकार हुए सुबोध राय इंडियन क्रिकेट प्रीमियर लीग के अलावा राष्ट्रीय स्तर के कई टूर्नामेंट खेल चुके हैं। अनंतपुर में 2013 में हुए क्रिकेट लीग में वह उप कप्तान की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। वह वर्ष 2012 में संपूर्णानंद सिगरा स्टेडियम में पहली बार पिच पर उतरे थे। तब से उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनका कहना है कि अगर इच्छाशक्ति हो तो आदमी मंजिल हर हाल में हासिल कर सकता है।
दिव्यांग क्रिकेट के अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी और डीएवी कॉलेज में कोच अजय यादव इस विधा के प्रदेश के पहले खिलाड़ी (1997) बने। उनके मन में यह स्पष्ट था कि उनको खुद को साबित करने के साथ ही और ऐसे बच्चों को आगे ले जाना है। बताया कि पहले इसके लिए अलग-अलग जिलों में खिलाड़ियों की तलाश की और लोगों को खेल के प्रति प्रेरित किया। उनके नेतृत्व में वाराणसी की टीम ने लगातार कई साल प्रदेश में अपना दबदबा बनाया। इन दिनों उनकी प्रशिक्षण लिस्ट में दो सौ से ज्यादा दिव्यांग बच्चों के नाम पंजीकृत हैं।