जिला पंचायत, क्षेत्र पंचायत से ग्राम पंचायत तक महिलाओं की समुचित भागीदारी का ख्वाब 33 फीसदी आरक्षण के बाद भी कहीं घूंघट की ओट में संकुचाया तो कहीं घरों की देहरी पर ठिठक गया है। निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधियों में अधिकतर की भूमिका अब भी रबर स्टैंप तक सीमित है।
मान मिलने के बाद भी कमान उनके हाथ नहीं है। कहीं पुत्र तो कहीं पति उनकी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। जिला पंचायत से ग्राम पंचायत तक हालात एक जैसे हैं। महत्वपूर्ण बैठकों में भी महिला जनप्रतिनिधियों की भागीदारी नगण्य होती है।
उनके पुत्र और पति नियम न होने के बावजूद इन बैठकों में न सिर्फ उपस्थिति दर्ज कराते हैं बल्कि उनके नाम और मुहर से बाकायदा प्रस्ताव भी प्रस्तुत करते हैं और भत्ता भी हासिल करते हैं। वाराणसी जिले के सबसे बड़े विकास खंड आराजीलाइन से पांच महिलाएं जिला पंचायत सदस्य हैं।
662 महिलाएं ग्राम पंचायत सदस्य और 45 महिलाएं ग्राम प्रधान। 72 महिलाएं क्षेत्र पंचायत सदस्य हैं। प्रतिनिधित्व के लिहाज से मजबूत दखल के बावजूद इक्का-दुक्का को छोड़ अधिकतर महिला जनप्रतिनिधियों को उनके क्षेत्र के ही लोग नहीं पहचानते।
खोचवा की ग्राम प्रधान खेसरा देवी कहती हैं कि बैठकों में महिलाओं की संख्या बहुत कम होती है। पुरुषों की भीड़ में इक्का-दुक्का महिलाओं को बोलने तक का अवसर नहीं मिल पाता।
एडीओ पंचायत सुनील सिंह कहते हैं कि बैठकों में प्रतिनिधि भेजने का कोई प्रावधान नहीं है, बावजूद इसके निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधियों के पति और पुत्र मनमानी करते हैं।