विवाहित महिलाओं को है श्राद्ध करने का अधिकार
महिलाएं श्राद्ध के लिए सफेद या पीले कपड़े पहन सकती हैं। केवल विवाहित महिलाओं को ही श्राद्ध करने का अधिकार है। श्राद्ध करते वक्त महिलाओं को कुश और जल के साथ तर्पण नहीं करना चाहिए। साथ ही काले तिल से भी तर्पण न करें। ऐसा करने का महिलाओं को अधिकार नहीं है।
बहू या पत्नी कर सकती है श्राद्ध
पुत्र या पति के नहीं होने पर कौन श्राद्ध कर सकता है इस बारे में गरुड़ पुराण के ग्यारहवें अध्याय में बताया गया है। उसमें कहा गया है कि ज्येष्ठ पुत्र या कनिष्ठ पुत्र के अभाव में बहू, पत्नी को श्राद्ध करने का अधिकार है। इसमें ज्येष्ठ पुत्री या एकमात्र पुत्री भी शामिल है।
अगर पत्नी भी जीवित न हो तो सगा भाई अथवा भतीजा, भांजा, नाती, पोता आदि कोई भी श्राद्ध कर सकता है। इन सबके अभाव में शिष्य, मित्र, कोई भी रिश्तेदार अथवा कुल पुरोहित मृतक का श्राद्ध कर सकता है। इस प्रकार परिवार के पुरुष सदस्य के अभाव में कोई भी महिला सदस्य व्रत लेकर पितरों का श्राद्ध-तर्पण कर सकती है।
सीताजी ने दिया राजा दशरथ को पिंडदान
वनवास के दौरान जब श्रीराम लक्ष्मण और माता सीता के साथ पितृ पक्ष के दौरान गया पहुंचे तो श्राद्ध के लिए कुछ सामग्री लेने गए। उसी दौरान माता सीता को राजा दशरथ के दर्शन हुए जो उनसे पिंड दान की कामना कर रहे थे। इसके बाद माता सीता ने फल्गु नदी, वटवृक्ष, केतकी फूल और गाय को साक्षी मानकर बालू का पिंड बनाकर फल्गु नदी के किनारे श्री दशरथ जी महाराज का पिंडदान कर दिया।